बिहार संग्रहालय विश्व में 9वें और एशिया में पहले स्थान पर, जानें पूरी उपलब्धि
पटना के बिहार संग्रहालय को ‘वर्ल्ड्स 100 बेस्ट म्यूजियम्स 2026’ की सूची में विश्व स्तर पर नौवां और एशिया में पहला स्थान मिला है। इस उपलब्धि पर ब्रिटिश लिंग्वा के प्रबंध निदेशक डॉ. बीरबल झा ने बिहार के कला एवं संस्कृति मंत्री डॉ. प्रमोद कुमार, संग्रहालय के महानिदेशक अंजनी कुमार सिंह और पूरी टीम को बधाई दी। उन्होंने इसे बिहार की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का अंतरराष्ट्रीय सम्मान बताया।
पटना स्थित बिहार संग्रहालय ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धि हासिल की है। ‘वर्थ अ जर्नी’ की ओर से जारी ‘वर्ल्ड्स 100 बेस्ट म्यूजियम्स 2026’ की सूची में संग्रहालय को दुनिया में नौवां और एशिया में पहला स्थान मिला है। इस उपलब्धि से बिहार की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान मिली है।
इस सफलता पर ब्रिटिश लिंग्वा के प्रबंध निदेशक, शिक्षाविद् और लेखक डॉ. बीरबल झा ने बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति मंत्री डॉ. प्रमोद कुमार, संग्रहालय के महानिदेशक और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी अंजनी कुमार सिंह सहित सभी अधिकारियों, कर्मचारियों और पूरी टीम को बधाई दी है।
दूरदर्शी नेतृत्व और टीमवर्क को दिया श्रेय
डॉ. बीरबल झा ने कहा कि बिहार संग्रहालय की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग केवल किसी एक संस्थान की उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह राज्य की सभ्यता, सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक विरासत को मिला सम्मान है। उनके मुताबिक, सही नेतृत्व, पेशेवर प्रबंधन और टीम के सामूहिक प्रयासों से बिहार की संस्थाएं भी वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना सकती हैं।
उन्होंने कला एवं संस्कृति मंत्री डॉ. प्रमोद कुमार के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि राज्य की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और विकास में विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण है। इस उपलब्धि से बिहार के दूसरे संग्रहालयों और ऐतिहासिक स्थलों को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी।
डॉ. झा ने संग्रहालय के महानिदेशक अंजनी कुमार सिंह के नेतृत्व की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि किसी संस्थान को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए दूरदर्शी सोच, कुशल प्रबंधन और समर्पित टीम की जरूरत होती है। बिहार संग्रहालय की सफलता इन सभी प्रयासों का परिणाम है।
उन्होंने बिहार की ऐतिहासिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि नालंदा और विक्रमशिला जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्र, बौद्ध एवं जैन परंपराएं, मौर्यकालीन इतिहास और कला-संस्कृति राज्य की पहचान रहे हैं। बिहार संग्रहालय अपनी आधुनिक व्यवस्था, दीर्घाओं और संग्रह के जरिए इस विरासत को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत कर रहा है।
संग्रहालय के कर्मचारियों को अंग्रेजी प्रशिक्षण देने में ब्रिटिश लिंग्वा का योगदान
इस मौके पर डॉ. झा ने बिहार संग्रहालय और ब्रिटिश लिंग्वा के बीच हुए सहयोग का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि लिंग्वा मल्टीसर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के अंतर्गत संचालित ब्रिटिश लिंग्वा ने संग्रहालय के अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए अंग्रेजी बोलने का विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया था।
उनके अनुसार, 15 जनवरी 2026 को जारी कार्यादेश के बाद शुरू हुआ यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 9 अप्रैल 2026 को पूरा हुआ। इसके बाद 8 मई 2026 को संग्रहालय प्रशासन ने प्रमाण-पत्र जारी कर कार्यक्रम की सफलता और ब्रिटिश लिंग्वा के योगदान की सराहना की। प्रमाण-पत्र पर संग्रहालय के अपर निदेशक अशोक कुमार सिन्हा के हस्ताक्षर थे।
डॉ. झा ने कहा कि प्रशिक्षण से कर्मचारियों के संवाद कौशल और आत्मविश्वास में सुधार हुआ। उनके मुताबिक, संग्रहालय आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों, शोधार्थियों और विद्वानों से प्रभावी बातचीत के लिए भाषा और संचार क्षमता महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि संग्रहालय के कर्मचारियों की इस क्षमता को बेहतर बनाने में योगदान देना ब्रिटिश लिंग्वा के लिए गर्व की बात है।
सांस्कृतिक पर्यटन को मिल सकता है बढ़ावा
डॉ. झा ने बिहार संग्रहालय की इस उपलब्धि को राज्य में सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पर्यटन के विस्तार का अवसर बताया। उनका मानना है कि अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने से दुनिया भर के इतिहासकारों, शोधार्थियों, कला प्रेमियों और पर्यटकों का ध्यान बिहार की ओर आकर्षित हो सकता है।
उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य के संग्रहालयों, पुरातात्विक स्थलों, ऐतिहासिक स्मारकों और पारंपरिक कला रूपों को जोड़कर एक समन्वित सांस्कृतिक पर्यटन परिपथ विकसित किया जा सकता है। इससे बिहार की सांस्कृतिक विरासत को व्यापक स्तर पर प्रदर्शित करने का अवसर मिलेगा।
डॉ. झा ने कहा कि विकास का मतलब केवल आर्थिक तरक्की नहीं है। अपनी विरासत पर गर्व, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और इतिहास के प्रति जागरूकता भी विकसित समाज की पहचान हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि बिहार संग्रहालय की यह सफलता राज्य की अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं को भी बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित करेगी और बिहार को अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्र पर नई पहचान दिलाएगी।
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