अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ रोकने के लिए भारत की संधि की मांग, UN में बोलीं सुधा मूर्ति

बाहरी अंतरिक्ष में बढ़ते सैन्य खतरों के बीच भारत ने सभी देशों के लिए स्वीकार्य और कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि की मांग उठाई है। राज्यसभा सांसद सुधा मूर्ति ने संयुक्त राष्ट्र में अंतरिक्ष सुरक्षा, PAROS पहल, PPWT मसौदे और सत्यापन व्यवस्था पर भारत का पक्ष रखा।

Oct 21, 2026 - 09:01
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अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ रोकने के लिए भारत की संधि की मांग, UN में बोलीं सुधा मूर्ति

बाहरी अंतरिक्ष में बढ़ती सैन्य गतिविधियों और हथियारों की होड़ को लेकर भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि बनाने की वकालत की है। राज्यसभा सांसद सुधा मूर्ति ने संयुक्त राष्ट्र में भारत का पक्ष रखते हुए कहा कि अंतरिक्ष की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ऐसा समझौता जरूरी है, जिसे सभी देश स्वीकार कर सकें और जिसके अनुपालन की पुष्टि भी संभव हो।

सुधा मूर्ति संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल सांसदों के दूसरे समूह का हिस्सा हैं। उन्होंने अंतरिक्ष में स्थिरता बनाए रखने के लिए बहुपक्षीय बातचीत और प्रभावी अंतरराष्ट्रीय नियमों पर जोर दिया।

अंतरिक्ष सुरक्षा के लिए व्यापक नीति जरूरी

सुधा मूर्ति के मुताबिक, अंतरिक्ष में सुरक्षा से जुड़े सभी पहलुओं पर एक साथ विचार करना जरूरी है। इसमें संभावित खतरे, गलतफहमी, गलत आकलन और बल प्रयोग की परिभाषा जैसे मुद्दे शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि किसी एक प्रकार के खतरे पर ध्यान केंद्रित करके अन्य जोखिमों को नजरअंदाज करना प्रभावी समाधान नहीं होगा। उनके अनुसार, इस विषय पर बातचीत आगे बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र का जिनेवा स्थित निरस्त्रीकरण सम्मेलन (Conference on Disarmament) उपयुक्त मंच है।

दोहरे उपयोग वाली अंतरिक्ष तकनीक बनी चुनौती

अंतरिक्ष में इस्तेमाल होने वाली कई तकनीकों और उपकरणों का उपयोग नागरिक उद्देश्यों के साथ-साथ सैन्य गतिविधियों में भी किया जा सकता है। ऐसी तकनीकों को दोहरे उपयोग वाली तकनीक कहा जाता है।

सुधा मूर्ति ने इस वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ठोस कार्रवाई की आवश्यकता बताई। अंतरिक्ष में सैन्य क्षमताओं के विकास और उनके संभावित इस्तेमाल को लेकर विभिन्न देशों के बीच मतभेद भी इस मुद्दे को जटिल बनाते हैं।

PAROS समझौते पर देशों के बीच मतभेद

बाहरी अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ रोकने की पहल को PAROS कहा जाता है। इस दिशा में प्रस्तावित नियमों और समझौतों को लेकर प्रमुख देशों के विचार अलग-अलग रहे हैं।

भारत चीन और रूस की ओर से वर्ष 2008 में पेश किए गए बाहरी अंतरिक्ष संधि मसौदे PPWT को आगे की चर्चा के आधार के रूप में देखता है। हालांकि, अमेरिका ने इस मसौदे पर आपत्ति जताई थी। उसकी प्रमुख चिंताओं में पृथ्वी से संचालित एंटी-सैटेलाइट प्रणालियों से जुड़े खतरों का पर्याप्त समावेश नहीं होना और सत्यापन व्यवस्था की सीमाएं शामिल थीं।

अंतरिक्ष में परमाणु हथियारों पर भी मतभेद

वर्ष 2024 में अमेरिका और जापान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अंतरिक्ष में परमाणु हथियारों की तैनाती रोकने से संबंधित प्रस्ताव पेश किया था। रूस ने इस प्रस्ताव पर वीटो का इस्तेमाल किया, जिससे इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय मतभेद सामने आए।

यह घटनाक्रम दिखाता है कि अंतरिक्ष सुरक्षा के लिए साझा नियम बनाने में प्रमुख देशों के बीच सहमति हासिल करना एक बड़ी चुनौती है।

कानूनी समझौते का विकल्प नहीं बन सकते विश्वास बहाली के उपाय

सुधा मूर्ति ने कहा कि भारत ऐसे अंतरराष्ट्रीय नियमों का समर्थन करता है, जो सभी देशों पर समान रूप से लागू हों और जिनमें पारदर्शिता तथा आपसी विश्वास बढ़ाने के उपाय शामिल हों।

उन्होंने स्पष्ट किया कि ये उपाय कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौते को मजबूत कर सकते हैं, लेकिन उसकी जगह नहीं ले सकते। भारत का जोर ऐसी व्यापक संधि पर है, जिस पर बहुपक्षीय बातचीत के जरिए सहमति बने और जिसके पालन की पुष्टि की जा सके।

निष्कर्ष: भारत ने अंतरिक्ष को सुरक्षित और स्थिर बनाए रखने के लिए साझा अंतरराष्ट्रीय नियमों तथा बाध्यकारी संधि की जरूरत पर जोर दिया है। इस दिशा में प्रगति के लिए प्रमुख देशों के बीच मतभेद दूर करना और प्रभावी सत्यापन व्यवस्था पर सहमति बनाना महत्वपूर्ण होगा।

फैक्ट-चेक नोट: प्रकाशन से पहले सुधा मूर्ति के संयुक्त राष्ट्र में दिए गए मूल वक्तव्य, 2008 के PPWT मसौदे और 2024 के सुरक्षा परिषद प्रस्ताव से संबंधित विवरणों की आधिकारिक स्रोतों से पुष्टि करें।

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