PM Modi ने शेयर किया गीता का श्लोक, सत्य और हितकारी वाणी का दिया संदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर श्रीमद्भगवद्गीता का 17वें अध्याय का 15वां श्लोक साझा किया। श्लोक में ऐसी वाणी को महत्व दिया गया है जो सत्य, प्रिय, हितकारी और किसी के मन में उद्वेग पैदा न करने वाली हो।

Sep 24, 2026 - 09:41
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PM Modi ने शेयर किया गीता का श्लोक, सत्य और हितकारी वाणी का दिया संदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक संस्कृत सुभाषित साझा किया। इस संदेश के जरिए उन्होंने ऐसी वाणी के महत्व को रेखांकित किया, जो सत्य होने के साथ-साथ प्रिय और दूसरों के लिए हितकारी हो। प्रधानमंत्री की पोस्ट में विचारपूर्वक बोलने और स्वाध्याय के महत्व का भी उल्लेख किया गया।

पीएम मोदी ने शेयर किया संस्कृत श्लोक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक साझा किया—

“अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।

स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥”

इसका भावार्थ है कि व्यक्ति को ऐसी भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए, जिससे किसी दूसरे के मन में अनावश्यक अशांति या तनाव पैदा न हो। वाणी सत्य, मधुर और कल्याणकारी होनी चाहिए। साथ ही ज्ञानवर्धक ग्रंथों का नियमित अध्ययन और चिंतन भी वाणी की साधना का हिस्सा माना गया है।

भगवद्गीता के 17वें अध्याय का श्लोक

साझा किया गया श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय के 15वें श्लोक में आता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने ‘वाङ्मय तप’ यानी वाणी से संबंधित तप की व्याख्या की है। इसमें ऐसी भाषा को महत्व दिया गया है, जो सत्य, प्रिय, हितकारी और दूसरों के लिए अनुद्वेगकारी हो।

वाणी को बताया गया आत्म-अनुशासन का माध्यम

श्लोक का संदेश केवल मीठा बोलने तक सीमित नहीं है। इसमें सत्य बोलने के साथ यह भी बताया गया है कि शब्दों का इस्तेमाल इस तरह किया जाए जिससे सामने वाले को अनावश्यक पीड़ा न पहुंचे।

इस दृष्टि से वाणी को आत्म-अनुशासन का एक माध्यम माना गया है। व्यक्ति के शब्द किसी के मन को चोट पहुंचा सकते हैं, लेकिन वही शब्द विश्वास, शांति और सकारात्मक सोच को भी बढ़ावा दे सकते हैं।

स्वाध्याय का भी है विशेष महत्व

श्लोक में स्वाध्याय और अभ्यास को भी वाणी की तपस्या का हिस्सा बताया गया है। इसका व्यापक अर्थ ज्ञान और अच्छे विचारों से लगातार जुड़े रहना है।

नियमित अध्ययन और चिंतन से व्यक्ति के विचारों में परिपक्वता आ सकती है और इसका प्रभाव उसके बोलने के तरीके पर भी पड़ता है। इस तरह ज्ञान, विचार और वाणी के बीच संबंध को इस श्लोक में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

आज के समय में भी प्रासंगिक संदेश

सोशल मीडिया और डिजिटल संचार के दौर में शब्दों का प्रभाव तेजी से व्यापक हो सकता है। ऐसे समय में सत्य, संयमित और जिम्मेदार भाषा के महत्व का संदेश विशेष रूप से प्रासंगिक दिखाई देता है।

प्रधानमंत्री द्वारा साझा किए गए इस श्लोक का मूल भाव यही है कि बोलने से पहले शब्दों और उनके प्रभाव पर विचार किया जाए। वाणी में सत्य के साथ संवेदनशीलता और दूसरों के हित का भी ध्यान रखा जाए।

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