दुधवा टाइगर रिजर्व में सुहेली नदी का सर्वेक्षण, 100 साल के बदलावों की होगी जांच
उत्तर प्रदेश के दुधवा टाइगर रिजर्व में सुहेली नदी का व्यापक जल-पारिस्थितिक सर्वेक्षण कराया जाएगा। राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रुड़की के वैज्ञानिक नदी के पिछले 100 वर्षों के प्रवाह मार्ग, जल विज्ञान और पारिस्थितिकी में हुए बदलावों का अध्ययन करेंगे। सर्वेक्षण के लिए 86 लाख रुपये आवंटित किए गए हैं।
उत्तर प्रदेश के दुधवा टाइगर रिजर्व में सुहेली नदी के बदलते स्वरूप और जल प्रवाह का विस्तृत अध्ययन कराया जाएगा। इस सर्वेक्षण के जरिए पिछले 100 वर्षों के दौरान नदी के बहाव मार्ग, जल प्रवाह और पारिस्थितिकी में हुए बदलावों का आकलन किया जाएगा। अध्ययन का उद्देश्य नदी की मौजूदा स्थिति को समझना और उसके संरक्षण एवं पुनर्स्थापन के लिए वैज्ञानिक उपाय सुझाना है।
दुधवा टाइगर रिजर्व के क्षेत्रीय निदेशक एच. राजमोहन ने बुधवार को बताया कि इस अध्ययन के लिए 86 लाख रुपये आवंटित किए गए हैं। राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच), रुड़की के वैज्ञानिकों की एक टीम ने रविवार को नदी का प्रारंभिक निरीक्षण भी किया। प्रदीप सचान के नेतृत्व में पहुंची टीम विस्तृत सर्वेक्षण से पहले नदी की स्थिति का आकलन कर रही है।
सुहेली नदी का दुधवा के जंगलों के लिए क्या है महत्व?
नेपाल से निकलने वाली सुहेली नदी दुधवा टाइगर रिजर्व के जंगलों के दक्षिणी हिस्से से होकर गुजरती है और तिकुनिया क्षेत्र के पास घाघरा नदी में मिलती है। नदी और उससे जुड़ी जल प्रणालियां इलाके के जंगलों, घास के मैदानों, आर्द्रभूमियों और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
हाल के मानसून के दौरान जलकुंभी से भरी सुहेली नदी बंशीनगर के पास अपने किनारों से बाहर बहने लगी थी। इससे दुधवा-गौरीफंटा सड़क को नुकसान पहुंचा और कुछ दिनों तक इस मार्ग पर वाहनों की आवाजाही रोकनी पड़ी थी। इस घटना ने नदी के प्रवाह और उसकी मौजूदा स्थिति के वैज्ञानिक आकलन की जरूरत को फिर से सामने रखा।
जल प्रवाह और पारिस्थितिकी में बदलावों की होगी जांच
एच. राजमोहन के मुताबिक, सर्वेक्षण में नदी के जल विज्ञान और पारिस्थितिकी से जुड़े कई पहलुओं की पड़ताल की जाएगी। वैज्ञानिक पिछले एक शताब्दी के दौरान नदी के बहाव मार्ग, जल प्रवाह और प्राकृतिक परिस्थितियों में हुए बदलावों का दस्तावेजीकरण करेंगे। साथ ही, भविष्य में नदी की स्थिति में संभावित बदलावों का भी आकलन किया जाएगा।
इस अध्ययन से नदी की मौजूदा समस्याओं को समझने और उन्हें दूर करने के लिए उचित कदम तय करने में मदद मिलने की उम्मीद है। इसके निष्कर्षों के आधार पर संरक्षण और पुनर्स्थापन से जुड़े उपायों की सिफारिश की जाएगी।
गाद निकालने के फायदे और नुकसान का भी होगा आकलन
सर्वेक्षण का एक महत्वपूर्ण पहलू यह पता लगाना होगा कि सुहेली नदी से गाद निकालना पर्यावरण की दृष्टि से उचित है या नहीं। वैज्ञानिक यह भी जांचेंगे कि इस तरह की गतिविधि का नदी में रहने वाले जलीय जीवों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर क्या असर पड़ सकता है।
नदी की स्थिति सुधारने के लिए किसी भी कदम से पहले उसके संभावित पर्यावरणीय प्रभावों को समझना जरूरी माना जा रहा है। इसी वजह से अध्ययन में नदी के प्राकृतिक प्रवाह और जलीय जीवन से जुड़े पहलुओं को भी शामिल किया जाएगा।
उपग्रह तकनीक से जुटाया जाएगा डेटा
क्षेत्रीय निदेशक ने बताया कि सर्वेक्षण में उपग्रह आधारित अध्ययन भी शामिल होगा। इससे नदी के बहाव मार्ग और समय के साथ हुए भौगोलिक बदलावों को समझने में मदद मिल सकती है।
अध्ययन पूरा होने के बाद इसके निष्कर्ष राज्य सरकार को सौंपे जाएंगे। इन्हीं निष्कर्षों के आधार पर नदी के संरक्षण, गाद निकालने और अन्य संभावित कार्यों को लेकर आगे के निर्णय लिए जा सकेंगे।
राजमोहन के अनुसार, करीब एक साल पहले नदी से गाद निकालने और उससे जुड़े अन्य कार्यों को लेकर अलग-अलग मत सामने आए थे। इस मामले में कानूनी कार्यवाही भी शुरू हुई थी। इसके बाद नदी की स्थिति का वैज्ञानिक और व्यापक आकलन कराने पर विचार किया गया, ताकि भविष्य के फैसले प्रमाणों के आधार पर लिए जा सकें।
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