भारत की अर्थव्यवस्था में रेजिलिएंस जरूरी, विकास के साथ वित्तीय स्थिरता पर जोर
वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, बढ़ते कर्ज और तकनीकी बदलावों के बीच भारत के लिए आर्थिक विकास के साथ वित्तीय स्थिरता और रेजिलिएंस मजबूत करना महत्वपूर्ण है।
दुनिया की अर्थव्यवस्था इस समय कई तरह की चुनौतियों से एक साथ गुजर रही है। भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े जोखिम, वैश्विक पूंजी प्रवाह में बदलाव, बढ़ता कर्ज और तेजी से हो रहा तकनीकी परिवर्तन अब अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं देखे जा सकते। इनका असर एक-दूसरे से जुड़कर वैश्विक आर्थिक व्यवस्था पर पड़ रहा है।
ऐसे माहौल में भारत के लिए केवल तेज आर्थिक विकास बनाए रखना ही पर्याप्त नहीं है। वित्तीय स्थिरता, जोखिमों से निपटने की क्षमता और आर्थिक लचीलापन भी नीति निर्माण के महत्वपूर्ण हिस्से बन गए हैं। नई दिल्ली में आयोजित कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में वित्त मंत्री और भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर की ओर से रखे गए विचारों में इसी व्यापक दृष्टिकोण पर जोर दिया गया।
वैश्विक झटकों के बीच भारत की स्थिति
वित्त मंत्री ने भारत की आर्थिक मजबूती का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले वर्षों में सरकार की विभिन्न योजनाओं ने आर्थिक और सामाजिक आधार को मजबूत करने में भूमिका निभाई है। जनधन-आधार-मोबाइल, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, आवास, स्वच्छ भारत, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत और खाद्य सुरक्षा जैसी पहलों के जरिए बड़ी आबादी तक आर्थिक और सामाजिक सहायता पहुंचाने का प्रयास किया गया है।
वित्तीय क्षेत्र में बैंकिंग प्रणाली की स्थिति, गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों में कमी, मुद्रास्फीति पर नियंत्रण, चालू खाते की स्थिति और विदेशी मुद्रा भंडार जैसे संकेतक भी आर्थिक स्थिरता के लिहाज से महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
विकास के साथ स्थिरता भी जरूरी
भारत की आगामी आर्थिक रणनीति में रणनीतिक स्वायत्तता, नियम-आधारित वैश्विक व्यापार व्यवस्था में सक्रिय भागीदारी, कौशल विकास, निजी क्षेत्र के निवेश तथा अनुसंधान एवं नवाचार को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इन क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए वित्तीय प्रणाली का मजबूत और भरोसेमंद होना जरूरी है। अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़ने के साथ वित्तीय संस्थानों की जोखिम झेलने की क्षमता भी मजबूत करनी होगी, ताकि बाहरी झटकों का असर व्यापक आर्थिक गतिविधियों पर कम से कम पड़े।
अच्छे दौर में भी सतर्कता जरूरी
आरबीआई गवर्नर ने वित्तीय स्थिरता से जुड़े जोखिमों पर सतर्क रहने की आवश्यकता पर जोर दिया। लंबे समय तक आर्थिक स्थिरता बनी रहने पर बाजार में जोखिम लेने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है और पिछली आर्थिक मंदियों के अनुभव धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकते हैं।
ऐसे में आर्थिक परिस्थितियां अनुकूल होने के दौरान भी जोखिमों की पहचान और निगरानी जारी रखना जरूरी है। वित्तीय स्थिरता के लिए तैयारी संकट आने के बाद नहीं, बल्कि सामान्य परिस्थितियों में ही मजबूत की जानी चाहिए।
आरबीआई की पांच प्रमुख प्राथमिकताएं
1. वित्तीय प्रणाली को और मजबूत करना
बैंकिंग और वित्तीय व्यवस्था में ऐसी क्षमता विकसित करना जरूरी है, जिससे घरेलू या वैश्विक संकट के दौरान बैंक, वित्तीय संस्थान और भुगतान प्रणालियां सुचारू रूप से काम करती रहें।
2. नए और आपस में जुड़े जोखिमों की पहचान
भू-राजनीतिक घटनाएं, साइबर हमले, तकनीकी गड़बड़ियां, वैश्विक कर्ज, परिसंपत्तियों की कीमतों में बदलाव और अंतरराष्ट्रीय पूंजी प्रवाह जैसे जोखिम अब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इनका समय रहते आकलन करना वित्तीय स्थिरता के लिए आवश्यक है।
3. बेहतर आंकड़ों की व्यवस्था
वित्तीय जोखिमों की सटीक पहचान के लिए गुणवत्तापूर्ण आंकड़ों की जरूरत होती है। एनबीएफसी, पूंजी बाजार, सीमा-पार वित्तीय एक्सपोजर और तकनीकी निर्भरताओं से जुड़े आंकड़ों को बेहतर बनाना जोखिम आकलन को अधिक प्रभावी बना सकता है।
4. पूरे वित्तीय इकोसिस्टम की मजबूती
वित्तीय स्थिरता केवल बैंकों तक सीमित नहीं है। एनबीएफसी, पूंजी बाजार, भुगतान प्रणालियां, डिजिटल और तकनीकी अवसंरचना तथा महत्वपूर्ण तृतीय-पक्ष सेवा प्रदाता भी वित्तीय व्यवस्था का हिस्सा हैं। इसलिए पूरे इकोसिस्टम की जोखिम झेलने की क्षमता बढ़ाना जरूरी है।
5. वित्तीय नवाचार में भरोसा बनाए रखना
एआई, टोकनाइजेशन और नई वित्तीय तकनीकों के विस्तार से वित्तीय सेवाओं में बदलाव हो रहा है। इन तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ाते हुए उपभोक्ता और निवेशकों की सुरक्षा, डेटा की विश्वसनीयता और वित्तीय प्रणाली की अखंडता पर भी ध्यान देना जरूरी है।
भारत के लिए आगे की राह
भारत की आर्थिक प्रगति को केवल जीडीपी की वृद्धि दर से नहीं देखा जा सकता। भविष्य में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि वैश्विक स्तर पर आने वाले आर्थिक, वित्तीय या भू-राजनीतिक झटकों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था कितनी मजबूती से अपनी गतिविधियों को जारी रख पाती है।
तेज विकास, वित्तीय स्थिरता और संकटों से निपटने की क्षमता के बीच संतुलन भारत की दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। यही संतुलन समावेशी, टिकाऊ और मजबूत आर्थिक विकास की आधारशिला तैयार करने में मदद करेगा।
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