नीलगिरी में चाय उत्पादन पर मानसून की मार, हरी पत्तियों की पैदावार में भारी गिरावट
नीलगिरी में कमजोर मानसून और मिट्टी में नमी की कमी से चाय की हरी पत्तियों का उत्पादन तेजी से घटा है। छोटे किसान कम कीमत और कम पैदावार के दोहरे दबाव से जूझ रहे हैं।
तमिलनाडु के नीलगिरी जिले में मानसून की कमजोर बारिश का सीधा असर चाय उत्पादन पर दिखाई देने लगा है। लंबे समय से पर्याप्त नमी नहीं मिलने के कारण चाय बागानों में हरी पत्तियों की पैदावार तेजी से घट गई है। छोटे चाय उत्पादकों के मुताबिक, मौजूदा सीजन में उत्पादन में आई गिरावट सामान्य से काफी अधिक है।
जिन बागानों में पहले एक एकड़ से महीनेभर में करीब 500 किलोग्राम हरी पत्तियां प्राप्त हो जाती थीं, वहां अब यह मात्रा घटकर लगभग 200 किलोग्राम रह गई है। उत्पादकों का कहना है कि इतनी बड़ी कमी लंबे समय बाद देखने को मिली है।
सिंचाई के लिए स्प्रिंकलर का सहारा
बारिश की कमी से निपटने के लिए कुछ किसानों ने अपने चाय बागानों में स्प्रिंकलर सिस्टम लगाना शुरू किया है। हालांकि, छोटे उत्पादकों के लिए सिंचाई उपकरण खरीदना और उसके संचालन का खर्च बड़ी चुनौती बना हुआ है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, बीच-बीच में हुई बारिश ने फिलहाल बागानों को कुछ राहत दी है, लेकिन अगर सूखे की स्थिति आगे भी बनी रही तो उत्पादन पर इसका असर और गंभीर हो सकता है।
50 फीसदी तक घट सकती है पैदावार
सामान्य परिस्थितियों में नीलगिरी क्षेत्र में चाय की वार्षिक उपज करीब 7 से 8 टन प्रति एकड़ मानी जाती है। मौजूदा सीजन में ही उत्पादन में लगभग 10 से 20 प्रतिशत की कमी का अनुमान लगाया जा रहा है।
यदि आने वाले समय में पर्याप्त बारिश नहीं होती है, तो वार्षिक पैदावार में करीब 50 प्रतिशत तक गिरावट आने की आशंका जताई जा रही है। मिट्टी में लगातार नमी की कमी रहने पर चाय की पत्तियों की कटाई के बीच का अंतर भी बढ़ सकता है। इसका असर चाय फैक्ट्रियों को मिलने वाली कच्ची पत्तियों की आपूर्ति पर पड़ेगा।
कम कीमत से किसानों की परेशानी बढ़ी
उत्पादन घटने के बावजूद चाय की हरी पत्तियों का खरीद मूल्य 20 रुपये प्रति किलोग्राम से नीचे बना हुआ है। ऐसे में किसानों को कम उत्पादन की भरपाई कीमतों में बढ़ोतरी से भी नहीं हो पा रही है।
जानकारों के अनुसार, चाय की कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय बाजार का प्रभाव रहता है। इसलिए किसी स्थानीय क्षेत्र में उत्पादन घटने के बावजूद किसानों को जरूरी नहीं कि अधिक खरीद मूल्य मिले।
दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भरता
नीलगिरी के चाय बागानों के लिए दक्षिण-पश्चिम मानसून बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। आम तौर पर जून से अगस्त के बीच होने वाली बारिश मिट्टी में पर्याप्त नमी बनाए रखने में मदद करती है।
क्षेत्र के अलग-अलग हिस्सों में मानसून का प्रभाव भी अलग रहता है। कोटागिरी को दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्व दोनों मानसून से बारिश मिलती है, जबकि कूनूर में उत्तर-पूर्व मानसून का योगदान अपेक्षाकृत अधिक रहता है।
15 साल में सबसे बड़ी बारिश की कमी का दावा
दक्षिण-पश्चिम मानसून के कमजोर रहने के बाद नीलगिरी जिले में कुल बारिश में करीब 55 प्रतिशत की कमी दर्ज किए जाने की बात सामने आई है। जानकार इस स्थिति को पिछले लगभग 15 वर्षों में दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान जिले में हुई सबसे बड़ी कमी बता रहे हैं।
बारिश की कमी के पीछे ‘सुपर अल नीनो’ के संभावित प्रभाव का भी उल्लेख किया जा रहा है।
उत्तर-पूर्व मानसून से किसानों को उम्मीद
अब चाय उत्पादकों की निगाहें उत्तर-पूर्व मानसून पर टिकी हैं। किसानों के लिए आने वाले समय में अच्छी बारिश बेहद जरूरी है, ताकि बागानों में मिट्टी की नमी दोबारा सामान्य हो सके और पौधों की वृद्धि में सुधार आए।
अगर पर्याप्त बारिश होती है तो उत्पादन में और गिरावट को रोका जा सकता है। वहीं, सूखा लंबा खिंचने पर छोटे चाय उत्पादकों की आर्थिक मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।
नीलगिरी में मौजूदा स्थिति यह बताती है कि बदलते मौसम और अनियमित मानसून का असर चाय जैसी वर्षा-आधारित फसलों पर कितना व्यापक हो सकता है। किसानों के लिए बेहतर सिंचाई सुविधाओं और मौसम आधारित कृषि प्रबंधन की जरूरत भी इस परिस्थिति में और महत्वपूर्ण हो गई है।
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