पीएम-आशा से किसानों को MSP का भरोसा, मूल्य समर्थन तंत्र हुआ मजबूत
पीएम-आशा योजना के जरिए किसानों को उनकी उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP सुनिश्चित करने और बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव से राहत देने के प्रयास किए जा रहे हैं। इससे किसानों के लिए मूल्य समर्थन व्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिली है।
PM-AASHA से किसानों को MSP का भरोसा, मजबूत हुआ मूल्य समर्थन तंत्र
किसानों को उनकी फसलों का बेहतर दाम दिलाने और बाजार में कीमतों में गिरावट के दौरान उन्हें नुकसान से बचाने के लिए केंद्र सरकार प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान यानी PM-AASHA को प्रमुख मूल्य समर्थन व्यवस्था के रूप में आगे बढ़ा रही है। योजना के तहत न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीद के साथ किसानों को बाजार की अनिश्चितता से सुरक्षा देने के लिए कई तंत्र लागू किए गए हैं।
PM-AASHA के अंतर्गत दालों, तिलहनों और खोपरा जैसी फसलों की खरीद NAFED और NCCF जैसी केंद्रीय एजेंसियों के माध्यम से की जाती है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए इस योजना के लिए 7,200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। खरीद प्रक्रिया में आधार आधारित सत्यापन और ई-नाम, ई-समृद्धि तथा ई-संयुक्ति जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल से पारदर्शिता बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है।
किसानों को कम कीमत पर बिक्री से बचाने की कोशिश
PM-AASHA की शुरुआत सितंबर 2018 में किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई थी। इसका एक प्रमुख लक्ष्य यह भी है कि बाजार भाव में अचानक गिरावट आने पर किसान अपनी फसल को मजबूरी में कम कीमत पर बेचने के लिए विवश न हों।
यह योजना अलग-अलग मूल्य समर्थन व्यवस्थाओं को एक साझा ढांचे में लाती है। फसल और बाजार की स्थिति को देखते हुए इसके विभिन्न घटकों का इस्तेमाल किया जाता है। इससे किसानों की आय में स्थिरता लाने और कृषि बाजार में मूल्य संबंधी जोखिम कम करने में मदद मिलती है।
खरीद सीजन से पहले शुरू होती है तैयारी
सरकार खरीद प्रक्रिया को समय पर शुरू करने के लिए विपणन सत्र आने से पहले ही तैयारियां शुरू करती है। केंद्रीय एजेंसियां और राज्य सरकारें फसल की आवक शुरू होने से पहले खरीद केंद्र, जरूरी बुनियादी ढांचा और अन्य व्यवस्थाएं तैयार करती हैं।
इसका उद्देश्य किसानों को फसल बेचने के लिए बेहतर व्यवस्था देना और MSP पर खरीद को प्रभावी तरीके से लागू करना है।
PM-AASHA में चार प्रमुख व्यवस्थाएं
PM-AASHA के तहत मुख्य रूप से चार घटक काम करते हैं। इनमें मूल्य समर्थन योजना (PSS), मूल्य स्थिरीकरण कोष (PSF), मूल्य अंतर भुगतान योजना (PDPS) और बाजार हस्तक्षेप योजना (MIS) शामिल हैं।
इन योजनाओं को संबंधित फसल और बाजार की परिस्थितियों के अनुसार लागू किया जाता है।
MSP से नीचे भाव आने पर PSS के तहत खरीद
मूल्य समर्थन योजना के तहत जब कटाई के दौरान बाजार भाव संबंधित फसल के MSP से नीचे चला जाता है, तब निर्धारित फसलों की MSP पर सरकारी खरीद की जाती है। दालें, तिलहन और खोपरा इसके प्रमुख दायरे में हैं।
राज्य सरकारों के अनुरोध पर NAFED और NCCF जैसी एजेंसियां खरीद प्रक्रिया में भाग लेती हैं। पात्र किसानों के सत्यापन से सीधे किसानों तक भुगतान पहुंचाने और बिचौलियों की भूमिका कम करने की कोशिश की जाती है।
खरीफ विपणन वर्ष 2024-25 से दालों, तिलहनों और खोपरा की खरीद के लिए सामान्य रूप से राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के उत्पादन के 25 प्रतिशत तक की सीमा निर्धारित की गई है। हालांकि तुअर, उड़द और मसूर की घरेलू उपलब्धता बढ़ाने के उद्देश्य से राज्य उत्पादन के 100 प्रतिशत तक खरीद की अनुमति दी गई है।
PSF से जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण
मूल्य स्थिरीकरण कोष का इस्तेमाल दालों, प्याज और आलू जैसी आवश्यक वस्तुओं का बफर स्टॉक तैयार करने में किया जाता है। फसल आने के समय खरीद कर भंडार तैयार किया जाता है और जब बाजार में आपूर्ति कम होती है तथा कीमतें बढ़ने लगती हैं, तब इन वस्तुओं को बाजार में उतारा जा सकता है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य उपभोक्ताओं और उत्पादकों दोनों को अचानक होने वाले मूल्य उतार-चढ़ाव के प्रभाव से बचाना है।
PDPS में सीधे खाते में मिल सकता है मूल्य अंतर
मूल्य अंतर भुगतान योजना में सरकार किसानों की फसल को सीधे खरीदने के बजाय MSP और वास्तविक बाजार मूल्य के बीच के अंतर की भरपाई करती है। यह राशि सीधे किसान के बैंक खाते में भेजी जाती है और भुगतान अधिकतम MSP के 15 प्रतिशत तक हो सकता है।
इस व्यवस्था का इस्तेमाल मुख्य रूप से तिलहन के लिए किया जाता है। इससे बड़े स्तर पर भौतिक खरीद केंद्रों की आवश्यकता कम होती है और किसानों को बाजार में अपनी फसल बेचने के बावजूद मूल्य सुरक्षा मिलती है।
बागवानी फसलों के लिए MIS का सहारा
बाजार हस्तक्षेप योजना ऐसे जल्दी खराब होने वाले कृषि और बागवानी उत्पादों के लिए है, जिन पर MSP लागू नहीं होता। टमाटर, प्याज और आलू इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
यदि बाजार कीमतें पिछले सामान्य सत्र की तुलना में कम से कम 10 प्रतिशत गिरती हैं, तो इस व्यवस्था के तहत हस्तक्षेप किया जा सकता है। NAFED और NCCF जैसी एजेंसियों के जरिए खरीद कर किसानों को अत्यधिक मूल्य गिरावट से राहत देने का प्रयास किया जाता है।
PM-AASHA का बजट बढ़कर 7,200 करोड़ रुपये
सरकार ने योजना के लिए बजटीय प्रावधान में वृद्धि की है। 2024-25 में PM-AASHA पर वास्तविक खर्च 5,437.99 करोड़ रुपये रहा था। 2025-26 में बजट प्रावधान 6,941.36 करोड़ रुपये किया गया, जबकि 2026-27 के लिए इसे बढ़ाकर 7,200 करोड़ रुपये कर दिया गया है।
यह वृद्धि किसानों को मूल्य सुरक्षा देने और खरीद व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में सरकार के बढ़ते प्रयास को दर्शाती है।
लागत से ऊपर MSP पर जोर
सरकार ने विभिन्न फसलों के MSP को उत्पादन लागत से ऊपर रखने पर भी जोर दिया है। 2026-27 के लिए धान सामान्य की उत्पादन लागत 1,627 रुपये प्रति क्विंटल और MSP 2,441 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित है।
इसी तरह सोयाबीन पीला की लागत 3,805 रुपये और MSP 5,708 रुपये प्रति क्विंटल है। गेहूं की लागत 1,239 रुपये के मुकाबले MSP 2,585 रुपये प्रति क्विंटल है। जूट की उत्पादन लागत 3,662 रुपये और MSP 5,925 रुपये प्रति क्विंटल है।
कृषि बाजार के बुनियादी ढांचे पर भी जोर
किसानों को फसल के बाद बेहतर बाजार उपलब्ध कराने के लिए सरकार कृषि अवसंरचना कोष और ई-नाम जैसी योजनाओं पर भी काम कर रही है।
कृषि अवसंरचना कोष के तहत 2,14,437 परियोजनाओं के लिए 96,426 करोड़ रुपये के ऋण मंजूर किए गए हैं। इससे 1,66,179 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश को प्रोत्साहन मिला है।
ई-नाम के माध्यम से 23 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों की 1,656 मंडियों को जोड़ा गया है। प्लेटफॉर्म पर 4,776 किसान उत्पादक संगठनों का पंजीकरण हुआ है और 7,334 FPO को ONDC से जोड़ा गया है।
डिजिटल तकनीक से खरीद में पारदर्शिता
PM-AASHA में डिजिटल व्यवस्थाओं को बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। किसानों के बायोमेट्रिक सत्यापन और पहले से पंजीकृत किसानों से सीधे खरीद जैसी व्यवस्थाओं को लागू किया गया है।
इन सुधारों का उद्देश्य खरीद प्रक्रिया को तेज करने, फर्जीवाड़े की संभावना कम करने और किसानों तक योजना का लाभ सीधे पहुंचाने का है।
बिहार में मसूर की संगठित खरीद
बिहार में NCCF के माध्यम से मसूर की संगठित खरीद शुरू की गई है। इसके लिए 48 प्राथमिक कृषि ऋण समितियों और किसान उत्पादक संगठनों को खरीद व्यवस्था से जोड़ा गया है।
10 अगस्त 2026 तक NCCF ने 1,042.65 मीट्रिक टन मसूर खरीदी थी। इस प्रक्रिया में 358 किसानों का पंजीकरण हुआ और 285 किसानों को लाभ मिला। इसी अवधि में NAFED ने 1,814.13 मीट्रिक टन मसूर की खरीद की और 455 किसानों को लाभ पहुंचा।
छत्तीसगढ़ में भी खरीद व्यवस्था मजबूत
छत्तीसगढ़ में 200 PACS और 12 FPO के नेटवर्क के जरिए PM-AASHA की खरीद व्यवस्था को विस्तार दिया गया है।
10 अगस्त 2026 तक NCCF ने 18,392.228 मीट्रिक टन चना, 22.231 मीट्रिक टन मसूर और 1,035.0205 मीट्रिक टन सरसों की खरीद की। इस प्रक्रिया में 21,721 किसानों का पंजीकरण हुआ और 13,790 किसानों को लाभ मिला।
वहीं NAFED ने इसी अवधि में 17,020.65 मीट्रिक टन चना और 355.05 मीट्रिक टन मसूर खरीदी। इसमें 46,146 किसानों का पंजीकरण हुआ और 13,673 किसानों को लाभ मिला।
किसानों को मूल्य सुरक्षा देने पर फोकस
PM-AASHA के जरिए सरकार ने MSP खरीद, मूल्य स्थिरीकरण और बाजार हस्तक्षेप को एक व्यापक व्यवस्था में जोड़ने की कोशिश की है। दालों, तिलहनों और खोपरा की खरीद के लिए NAFED और NCCF जैसी एजेंसियों की भूमिका बढ़ाई गई है।
डिजिटल सत्यापन, खरीद केंद्रों का विस्तार और कृषि बाजार से जुड़ी योजनाओं के जरिए पूरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने का प्रयास है। इसका मुख्य उद्देश्य किसानों को फसल का बेहतर मूल्य दिलाना और बाजार भाव गिरने की स्थिति में उन्हें नुकसान से बचाना है।
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