International Sign Language Day 2026: सांकेतिक भाषा सिर्फ इशारे नहीं, अधिकार और पहचान की आवाज

हर साल 23 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य बधिर समुदाय के भाषाई अधिकार, सांस्कृतिक पहचान और समाज में समान भागीदारी के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।

Sep 23, 2026 - 09:51
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International Sign Language Day 2026: सांकेतिक भाषा सिर्फ इशारे नहीं, अधिकार और पहचान की आवाज

शब्दों की आवाज हर किसी तक नहीं पहुंचती, लेकिन संवाद केवल बोलने से ही संभव नहीं होता। हाथों की गतिविधियां, चेहरे के भाव और शरीर के संकेत भी विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम बन सकते हैं। इसी महत्व को रेखांकित करने के लिए हर साल 23 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस मनाया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया में 7 करोड़ से अधिक बधिर लोग हैं और वे 300 से ज्यादा अलग-अलग सांकेतिक भाषाओं का इस्तेमाल करते हैं। सांकेतिक भाषाएं केवल हाथों के संकेतों का समूह नहीं, बल्कि अपनी संरचना और व्याकरण वाली प्राकृतिक भाषाएं हैं।

2026 की थीम क्या है?

वर्ष 2026 में अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस की थीम “Declaring Deaf People’s Human Rights” रखी गई है। इसका उद्देश्य बधिर लोगों के मानवाधिकारों को केवल नीतियों और घोषणाओं तक सीमित रखने के बजाय शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, न्याय और सार्वजनिक जीवन में वास्तविक रूप से लागू करने पर जोर देना है।

2026 का वर्ष इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विश्व बधिर महासंघ (WFD) की स्थापना के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं और संयुक्त राष्ट्र के दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर कन्वेंशन (CRPD) को अपनाए जाने के 20 वर्ष पूरे हो रहे हैं।

सांकेतिक भाषाएं पूर्ण प्राकृतिक भाषाएं

सांकेतिक भाषा को किसी बोली जाने वाली भाषा के शब्दों का हाथों से अनुवाद मानना सही नहीं है। इसमें हाथों की स्थिति, दिशा और गति के साथ चेहरे के भाव, सिर की गतिविधि और शरीर की अन्य अभिव्यक्तियां भी अर्थ निर्माण में भूमिका निभाती हैं।

अमेरिकन साइन लैंग्वेज (ASL) अंग्रेजी का केवल संकेतात्मक रूप नहीं है। इसी तरह भारतीय सांकेतिक भाषा (ISL) हिंदी या अंग्रेजी के व्याकरण पर आधारित नहीं है। अलग-अलग देशों और समुदायों में ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार अलग सांकेतिक भाषाएं विकसित हुई हैं।

23 सितंबर का महत्व

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2017 में प्रस्ताव A/RES/72/161 के जरिए 23 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस के रूप में घोषित किया था। यह दिवस पहली बार 2018 में मनाया गया। 23 सितंबर की तारीख 1951 में World Federation of the Deaf की स्थापना की वर्षगांठ से जुड़ी है।

यह दिवस सितंबर में मनाए जाने वाले International Week of Deaf People का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्ष 2026 में यह सप्ताह 21 से 27 सितंबर तक मनाया जा रहा है।

मानवाधिकारों से जुड़ा है सांकेतिक भाषा का अधिकार

सांकेतिक भाषा तक पहुंच को सिर्फ सुविधा के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। भाषा की उपलब्धता शिक्षा, सूचना, स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार, न्याय और सामाजिक भागीदारी से सीधे जुड़ी है।

संयुक्त राष्ट्र का Convention on the Rights of Persons with Disabilities सांकेतिक भाषाओं के उपयोग और बधिर समुदाय की भाषाई पहचान को मान्यता देता है। UN के अनुसार, शुरुआती उम्र से सांकेतिक भाषा और सांकेतिक भाषा में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच बधिर लोगों के विकास और अधिकारों की प्रभावी प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण है।

भारत में Indian Sign Language का महत्व

भारत जैसे बहुभाषी देश में Indian Sign Language (ISL) की भूमिका महत्वपूर्ण है। शिक्षा, सरकारी सेवाओं और सार्वजनिक जीवन में ISL की उपलब्धता बढ़ने से बधिर नागरिकों की भागीदारी को बेहतर बनाया जा सकता है।

ISL से जुड़ी शब्दावली, शिक्षण सामग्री, दुभाषिया प्रशिक्षण और डिजिटल संसाधनों का विस्तार इस दिशा में अहम कदम हैं। हालांकि केवल नीतियां बनाना पर्याप्त नहीं है। स्कूलों, अस्पतालों, अदालतों, सरकारी कार्यालयों और कार्यस्थलों पर प्रशिक्षित मानव संसाधन तथा सुलभ संचार व्यवस्था भी जरूरी है।

शिक्षा में भाषा की अहम भूमिका

बधिर बच्चों के लिए शुरुआती उम्र में ऐसी भाषा तक पहुंच जरूरी है जिसे वे आसानी से समझ और व्यक्त कर सकें। शिक्षा व्यवस्था में सांकेतिक भाषा को प्रभावी रूप से शामिल करने से विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ सामाजिक और भावनात्मक विकास के अवसर भी मिलते हैं।

समावेशी शिक्षा का मतलब सिर्फ बधिर बच्चे का सामान्य स्कूल में दाखिला नहीं है। वास्तविक समावेशन के लिए शिक्षक-विद्यार्थी संवाद, सुलभ पाठ्य सामग्री और जरूरत के अनुसार सांकेतिक भाषा की सुविधा भी जरूरी है।

स्वास्थ्य और न्याय व्यवस्था में सुलभ संचार

अस्पताल में मरीज को अपने लक्षण और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी सही तरीके से बताने की जरूरत होती है। इसी तरह डॉक्टर के निर्देशों को समझना भी जरूरी है। प्रशिक्षित सांकेतिक भाषा दुभाषियों की उपलब्धता संचार संबंधी बाधाओं को कम करने में मदद कर सकती है।

इसी तरह पुलिस स्टेशन, अदालत और सरकारी कार्यालयों में बधिर नागरिकों के लिए सुलभ संचार व्यवस्था उनकी नागरिक भागीदारी और कानूनी अधिकारों के इस्तेमाल को आसान बना सकती है।

रोजगार और डिजिटल दुनिया में नए अवसर

कार्यस्थल पर कैप्शनिंग, लिखित संचार, डिजिटल निर्देश और आवश्यकता के अनुसार दुभाषिया सेवाएं बधिर कर्मचारियों के लिए संवाद को अधिक सुलभ बना सकती हैं।

तकनीक के क्षेत्र में भी सांकेतिक भाषा से जुड़े नए प्रयोग हो रहे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और कंप्यूटर विजन आधारित तकनीकों के जरिए संकेतों को टेक्स्ट या आवाज में बदलने जैसी प्रणालियों पर काम किया जा रहा है। हालांकि ऐसी तकनीकों को विकसित करते समय बधिर समुदाय की प्रत्यक्ष भागीदारी महत्वपूर्ण मानी जाती है। WFD इसी संदर्भ में “Nothing About Us Without Us” के सिद्धांत पर जोर देता है।

परिवार से शुरू होता है समावेशन

समावेशन की शुरुआत परिवार से भी होती है। बधिर बच्चों के माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को सांकेतिक भाषा का ज्ञान मिलने से बच्चे के साथ संवाद बेहतर हो सकता है। इससे बच्चा अपनी भावनाएं व्यक्त करने, सवाल पूछने और परिवार के साथ मजबूत संबंध बनाने में अधिक सहज महसूस कर सकता है।

सांकेतिक भाषा और सांस्कृतिक पहचान

सांकेतिक भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं है। इसके साथ बधिर समुदाय की संस्कृति, इतिहास, पहचान और रचनात्मक अभिव्यक्तियां भी जुड़ी हैं। इसलिए सांकेतिक भाषाओं का संरक्षण भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को बनाए रखने से भी संबंधित है।

अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस का उद्देश्य इसी व्यापक दृष्टिकोण को सामने लाना है कि बधिर लोगों के अधिकारों की वास्तविक सुरक्षा तभी संभव है, जब उन्हें अपनी राष्ट्रीय सांकेतिक भाषा के माध्यम से जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समान अवसर मिले।

आगे की राह

भारत में सांकेतिक भाषा की पहुंच बढ़ाने के लिए प्रशिक्षित दुभाषियों की संख्या बढ़ाना, शिक्षकों को प्रशिक्षण देना, सार्वजनिक संस्थानों में सुलभ संचार व्यवस्था विकसित करना और डिजिटल सामग्री को अधिक सुलभ बनाना महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।

स्कूलों, अस्पतालों, अदालतों, पुलिस थानों और सरकारी कार्यालयों में आवश्यकता के अनुसार सांकेतिक भाषा सेवाओं को मजबूत करने से बधिर नागरिकों की भागीदारी को बेहतर समर्थन मिल सकता है।

अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस का संदेश यही है कि भाषा की बाधा किसी व्यक्ति के अधिकारों और अवसरों के रास्ते में नहीं आनी चाहिए। सांकेतिक भाषा को सम्मान और समान दर्जा देना केवल बधिर समुदाय के लिए सुविधा का विषय नहीं, बल्कि भाषाई विविधता, समान भागीदारी और मानवाधिकारों से जुड़ा विषय है।

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