हिंदी को बढ़ावा देने पर डॉ. जितेंद्र सिंह का जोर, बोले- भाषा थोपने के बजाय अवसर बढ़ाना जरूरी
केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि हिंदी के प्रसार का सबसे प्रभावी तरीका इसे अनिवार्य रूप से थोपना नहीं, बल्कि रोजगार, शिक्षा और पेशेवर विकास में इसके इस्तेमाल के अवसर बढ़ाना है। उन्होंने सरकारी कामकाज में सरल और सहज हिंदी के प्रयोग पर भी जोर दिया।
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और पीएमओ, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष विभाग के राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर महत्वपूर्ण बात कही है। उन्होंने कहा कि हिंदी को बढ़ाने के लिए इसे लोगों पर थोपने के बजाय ऐसी परिस्थितियां तैयार करनी चाहिए, जहां लोग इसके इस्तेमाल को स्वाभाविक रूप से उपयोगी समझें।
डॉ. जितेंद्र सिंह कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति की तीसरी बैठक को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि यदि हिंदी का ज्ञान रोजगार और करियर में आगे बढ़ने के अवसरों से जुड़ता है, तो लोगों में भाषा सीखने और इस्तेमाल करने की रुचि अपने आप बढ़ेगी।
सरकारी हिंदी सरल और आम बोलचाल के करीब हो
केंद्रीय मंत्री ने सरकारी कामकाज में इस्तेमाल होने वाली हिंदी को सरल और सहज बनाने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि सरकारी संचार ऐसी भाषा में होना चाहिए जिसे आम लोग आसानी से समझ सकें। अत्यधिक कठिन शब्दों या जरूरत से ज्यादा औपचारिक भाषा के इस्तेमाल से सरकारी संदेश लोगों के लिए जटिल हो सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी हिंदी केवल अंग्रेजी के शब्दशः अनुवाद जैसी नहीं दिखनी चाहिए, बल्कि उसका स्वरूप स्वाभाविक और सहज होना चाहिए।
दक्षिण भारत में भी हिंदी के इस्तेमाल का किया उल्लेख
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि पिछले करीब एक दशक में सरकारी कामकाज में हिंदी के इस्तेमाल में बढ़ोतरी देखने को मिली है। उन्होंने बताया कि दक्षिण भारत जैसे गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों में तैनात कई अधिकारी भी आधिकारिक कामकाज में हिंदी का उपयोग कर रहे हैं।
उन्होंने वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थानों में कार्यरत ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों का उदाहरण दिया, जो गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों में काम करने के बावजूद हिंदी का इस्तेमाल कर रहे हैं।
हिंदी को रोजगार और अवसरों से जोड़ने पर जोर
मंत्री ने कहा कि किसी भाषा के प्रति स्थायी रुचि पैदा करने के लिए उसके व्यावहारिक लाभ सामने आना जरूरी है। यदि हिंदी सीखने से रोजगार, कौशल और पेशेवर विकास के नए अवसर उपलब्ध होते हैं, तो लोग इसे स्वेच्छा से सीखने के लिए अधिक प्रेरित होंगे।
उन्होंने कहा कि कुछ ऐसे क्षेत्रों में भी हिंदी सीखने की मांग बढ़ रही है, जहां पहले इसका उपयोग अपेक्षाकृत कम था।
गैर-हिंदी भाषी राज्यों के साथ संवाद में व्यावहारिक दृष्टिकोण जरूरी
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकारी विभागों में हिंदी में काफी काम हो रहा है, लेकिन हर परिस्थिति में 100 प्रतिशत हिंदी का इस्तेमाल अनिवार्य करना व्यावहारिक नहीं है। विशेष रूप से गैर-हिंदी भाषी राज्यों के साथ आधिकारिक संवाद में वहां के लोगों और अधिकारियों की भाषाई सुविधा का ध्यान रखना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि भाषा के इस्तेमाल में संवेदनशीलता और व्यावहारिकता दोनों जरूरी हैं।
AI और तकनीक से अनुवाद की गुणवत्ता में सुधार
मंत्री ने सरकारी दस्तावेजों के अनुवाद में तकनीक की भूमिका का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पहले अनुवाद के दौरान कई बार अर्थ संबंधी गलतियां सामने आती थीं, लेकिन तकनीकी विकास के साथ स्थिति में सुधार हुआ है।
उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, आधुनिक अनुवाद प्रणालियों और बड़े डेटा सेट की मदद से तकनीकी और संवेदनशील विषयों के अनुवाद को बेहतर बनाया जा रहा है।
भाषा के साथ ज्ञान और विशेषज्ञता भी जरूरी
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भाषा के विस्तार को ज्ञान और पेशेवर दक्षता से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। जिन क्षेत्रों में हिंदी में पर्याप्त तकनीकी सामग्री या शब्दावली उपलब्ध नहीं है, वहां केवल भाषा पर जोर देने से ज्ञान हासिल करने में कठिनाई आ सकती है।
उन्होंने चिकित्सा शिक्षा का उदाहरण देते हुए कहा कि तकनीकी शब्दों को उनके मूल स्वरूप में रखते हुए उनकी व्याख्या और शिक्षण हिंदी में किया जा सकता है।
प्रतियोगिताओं में अधिक भाषाई विकल्प देने का सुझाव
बैठक में कौशल विकास से जुड़ी प्रतियोगिताओं में भाषा विकल्प बढ़ाने के सुझाव पर भी चर्चा हुई। डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि अधिक भाषाई विकल्प उपलब्ध कराने से छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों के लोगों को ऐसी प्रतियोगिताओं में भाग लेने में आसानी हो सकती है।
उन्होंने इस संबंध में उपयुक्त मौखिक घटकों को शामिल करने और भाषा विकल्प बढ़ाने का सुझाव संबंधित मंत्रालय तक पहुंचाने की बात कही।
हिंदी शिक्षण कार्यक्रमों में समिति की भागीदारी
मंत्री ने विद्यालयों में हिंदी शिक्षण से जुड़े कार्यक्रमों में हिंदी सलाहकार समिति के सदस्यों को शामिल करने के सुझाव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रस्ताव शिक्षा मंत्रालय के सामने रखे जा सकते हैं।
हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि कार्मिक विभाग अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर आने वाली गतिविधियों को सीधे संचालित नहीं कर सकता।
समिति के सुझावों पर कार्रवाई का आश्वासन
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि हिंदी सलाहकार समिति के सदस्यों की ओर से दिए गए सुझावों को विभाग ने गंभीरता से लिया है। अधिकार क्षेत्र में आने वाले सुझावों को लागू करने की दिशा में प्रयास किए जाएंगे, जबकि अन्य मामलों को संबंधित मंत्रालयों और विभागों के पास भेजा जाएगा।
‘कौशल पत्रिका’ का हुआ शुभारंभ
बैठक के दौरान कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग की ‘कौशल पत्रिका’ का भी शुभारंभ किया गया। मंत्री ने हिंदी सलाहकार समिति की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए सदस्यों से आगे भी लिखित अथवा अन्य उपयुक्त माध्यमों से अपने सुझाव साझा करते रहने का आग्रह किया।
भाषाई विविधता को ध्यान में रखकर हिंदी के विस्तार पर जोर
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि हिंदी के प्रसार का उद्देश्य इसे सरल, स्वाभाविक और समावेशी तरीके से आगे बढ़ाना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश की भाषाई विविधता और अलग-अलग क्षेत्रों की संचार जरूरतों को ध्यान में रखते हुए हिंदी के इस्तेमाल को बढ़ावा देना जरूरी है।
बैठक में हिंदी सलाहकार समिति के सदस्यों ने सरकारी कामकाज में हिंदी के प्रचार-प्रसार और इसके व्यापक उपयोग से जुड़े विभिन्न सुझाव दिए। विभाग ने अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले सुझावों पर आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)