UNGA 2026: नेपाल PM बालेंद्र शाह का बड़ा प्रस्ताव, भारत-चीन के साथ बनेगा हिमालयी क्लाइमेट रेजिलिएंस मैकेनिज्म
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में भारत और चीन के साथ मिलकर Himalayan Climate Resilience Mechanism बनाने का प्रस्ताव रखा। इसका उद्देश्य ग्लेशियल झीलों की निगरानी, सैटेलाइट डेटा साझा करना, शुरुआती चेतावनी प्रणाली मजबूत करना और आपदा के दौरान सीमा-पार राहत समन्वय करना है।
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते जलवायु और प्राकृतिक आपदा के खतरे को लेकर क्षेत्रीय सहयोग का प्रस्ताव रखा। अपने पहले UNGA संबोधन में शाह ने नेपाल, भारत और चीन के नेतृत्व में ‘हिमालयी जलवायु लचीलापन तंत्र’ (Himalayan Climate Resilience Mechanism) स्थापित करने की बात कही।
करीब दो अरब लोगों के लिए अहम है हिंदू कुश हिमालय
शाह ने कहा कि हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र करीब दो अरब लोगों के लिए पानी, कृषि, पारिस्थितिकी तंत्र और आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है। उन्होंने हिमालय को केवल किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं बताते हुए इसे पूरी धरती की जीवन-समर्थन प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।
उन्होंने कहा कि बढ़ते तापमान के कारण हिमालय का नाजुक पारिस्थितिक संतुलन प्रभावित हो रहा है और इसके प्रभाव सीमाओं से परे दिखाई दे रहे हैं।
सैटेलाइट डेटा और विशेषज्ञता साझा करने पर जोर
नेपाल के प्रधानमंत्री ने प्रस्तावित तंत्र के तहत सैटेलाइट डेटा और तकनीकी विशेषज्ञता साझा करने, खतरनाक हिमनदीय झीलों की निगरानी करने तथा संयुक्त प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने की बात कही।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि किसी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में नेपाल, भारत और चीन सीमा-पार राहत एवं सहायता के लिए बेहतर समन्वय विकसित करें।
बाढ़ और भूस्खलन के बढ़ते खतरे का जिक्र
शाह ने कहा कि पिघलता पर्माफ्रॉस्ट पर्वतीय ढलानों को अस्थिर कर रहा है, जिससे हिमस्खलन, बाढ़, भूस्खलन और अन्य श्रृंखलाबद्ध आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है। उन्होंने हाल की आपदा का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके प्रभाव नेपाल-चीन सीमा के दोनों ओर देखने को मिले और बाढ़ का पानी आगे भारत की दिशा में भी पहुंचा।
'हिमालय को सहयोग की प्रयोगशाला बनाएं'
बालेंद्र शाह ने क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने की अपील करते हुए कहा कि हिमालय को बिखरी हुई सूचनाओं की सीमा के बजाय अंतरराष्ट्रीय सहयोग की प्रयोगशाला बनाया जाना चाहिए। उन्होंने जलवायु परिवर्तन से प्रभावित देशों के लिए अधिक अंतरराष्ट्रीय समर्थन और आपदा से निपटने के लिए पहले से तैयारी पर भी जोर दिया।
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