कृषि शिक्षा में बदलाव पर जोर, डॉ. एम. एल. जाट ने वैश्विक सहयोग की अपील की
कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग के सचिव तथा ICAR महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने 2026 नॉर्मन ई. बोरलॉग इंटरनेशनल डायलॉग में कृषि उच्च शिक्षा को नए सिरे से तैयार करने पर जोर दिया। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय साझेदारी, उद्योग-अकादमिक सहयोग, नीति संवाद और टिकाऊ कृषि-खाद्य प्रणालियों के विकास को महत्वपूर्ण बताया।
जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों के घटते स्तर और जैव विविधता के नुकसान जैसी चुनौतियों के बीच कृषि शिक्षा और अनुसंधान में बदलाव की जरूरत बढ़ गई है। कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने कृषि उच्च शिक्षा को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप बनाने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि इसके लिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारी, उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग तथा ज्ञान के आदान-प्रदान को मजबूत करना जरूरी है।
नॉर्मन ई. बोरलॉग इंटरनेशनल डायलॉग में रखे विचार
डॉ. जाट ने अमेरिका के डेस मोइनेस में विश्व खाद्य पुरस्कार फाउंडेशन के कार्यक्रम के तहत आयोजित ‘2026 नॉर्मन ई. बोरलॉग इंटरनेशनल डायलॉग’ के दौरान एक गोलमेज सम्मेलन को संबोधित किया। नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (NAAS) के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने कृषि शिक्षा और अनुसंधान में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के महत्व को रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि बदलती कृषि-खाद्य प्रणालियों की जरूरतों को देखते हुए शिक्षा और अनुसंधान के तौर-तरीकों को विकसित करना होगा। इससे भविष्य के कृषि विशेषज्ञों को नई चुनौतियों के लिए तैयार करने में मदद मिलेगी।
उत्पादन से आगे बढ़कर पूरी मूल्य शृंखला पर ध्यान
डॉ. जाट ने पारंपरिक उत्पादन-केंद्रित कृषि के साथ-साथ एकीकृत कृषि-खाद्य प्रणालियों और मूल्य शृंखला आधारित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता बताई। उनके अनुसार, कृषि शिक्षा का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि खाद्य प्रणाली के विभिन्न चरणों से जुड़ी जरूरतों को भी समझना चाहिए।
उन्होंने उद्योग और शिक्षण संस्थानों के बीच मजबूत तालमेल पर जोर दिया। इससे उद्योग की जरूरतों के अनुरूप प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करने और किसानों को बेहतर सहायता देने के अवसर बढ़ सकते हैं। उन्होंने कृषि-खाद्य मूल्य शृंखला में उद्योग की भागीदारी को प्रोत्साहित करने की भी बात कही।
कृषि नीति और शोध के बीच बेहतर तालमेल जरूरी
डॉ. जाट ने कृषि से जुड़ी चुनौतियों का समाधान निकालने में नीति संवाद की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने नीति पत्रों और संक्षिप्त नीतिगत दस्तावेजों के माध्यम से शोध निष्कर्षों को निर्णय प्रक्रिया से जोड़ने की जरूरत पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि शोधकर्ताओं, नीति निर्माताओं, विश्वविद्यालयों, उद्योग और अन्य संबंधित पक्षों को साझा मंच पर लाकर समस्याओं के व्यावहारिक समाधान विकसित किए जा सकते हैं। इससे कृषि अनुसंधान और नीति निर्माण के बीच समन्वय मजबूत होगा।
वैश्विक भारतीय विशेषज्ञों को जोड़ने की पहल
डॉ. जाट ने विदेशों में कृषि क्षेत्र से जुड़े भारतीय विशेषज्ञों और समुदाय को देश के अनुसंधान तथा शैक्षणिक संस्थानों से जोड़ने की आवश्यकता भी बताई। ऐसे नेटवर्क के जरिए अंतरराष्ट्रीय अनुभव, विशेषज्ञता और नई तकनीकों का लाभ भारतीय कृषि शिक्षा को मिल सकता है।
उनके मुताबिक, ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए मजबूत संपर्क विकसित करना कृषि उच्च शिक्षा को आधुनिक बनाने और वैज्ञानिक सहयोग के नए अवसर तैयार करने में सहायक हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय संस्थागत साझेदारी से सहयोग की उम्मीद
डॉ. जाट ने कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी परिषद के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए जाने का भी उल्लेख किया। इस साझेदारी से कृषि अनुसंधान, क्षमता निर्माण और तकनीकी ज्ञान के आदान-प्रदान में सहयोग के नए अवसर विकसित होने की उम्मीद है।
उन्होंने कहा कि संस्थागत स्तर पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ने से कृषि शिक्षा और अनुसंधान को व्यापक अनुभव तथा विशेषज्ञता से जोड़ने में मदद मिल सकती है।
विकासशील देशों की जरूरतों को मिले प्राथमिकता
डॉ. जाट ने कहा कि वैश्विक साझेदारियों को मजबूत करते समय विकासशील देशों की चुनौतियों और प्राथमिकताओं का ध्यान रखना जरूरी है। उन्होंने टिकाऊ और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करने में सक्षम कृषि-खाद्य प्रणालियां विकसित करने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता बताई।
उन्होंने शिक्षा, अनुसंधान, उद्योग और नीति निर्माण के बीच बेहतर समन्वय को भविष्य की कृषि चुनौतियों से निपटने का महत्वपूर्ण आधार बताया।
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