26 अगस्त को जन्मी थीं मदर टेरेसा, गरीबों की सेवा को बनाया जीवन का लक्ष्य
मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त 1910 को स्कोप्जे में हुआ था। भारत में उन्होंने गरीबों, बीमारों और बेसहारा लोगों की सेवा के लिए मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना की। 1979 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार और 1980 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
मदर टेरेसा का नाम दुनिया भर में गरीबों, बीमारों और बेसहारा लोगों की सेवा से जुड़ा हुआ है। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा जरूरतमंद लोगों की मदद में लगाया और भारत में रहते हुए एक ऐसे सेवा संगठन की नींव रखी, जिसका काम बाद में दुनिया के कई देशों तक पहुंचा।
उनकी सेवाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। वर्ष 1979 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया। भारत सरकार ने 1980 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया।
स्कोप्जे में हुआ जन्म
मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त 1910 को स्कोप्जे में हुआ था, जो उस समय ऑटोमन साम्राज्य का हिस्सा था और अब उत्तर मैसेडोनिया की राजधानी है। उनका बचपन का नाम एग्नेस गोंझा बोयाजियू था। उनका परिवार अल्बानियाई मूल का था।
कम उम्र से ही उनका झुकाव धार्मिक गतिविधियों और समाज सेवा की ओर बढ़ने लगा था। युवावस्था में उन्होंने अपना जीवन धार्मिक सेवा को समर्पित करने का निर्णय लिया।
18 वर्ष की उम्र में छोड़ा घर
करीब 18 साल की उम्र में एग्नेस ने घर छोड़कर धार्मिक जीवन अपनाया। वह आयरलैंड गईं और लोरेटो सिस्टर्स से जुड़ीं। इसके बाद उनका संबंध भारत से जुड़ा और वर्ष 1929 में वह भारत पहुंचीं।
दार्जिलिंग में धार्मिक प्रशिक्षण लेने के बाद उन्होंने कोलकाता के सेंट मैरी स्कूल में शिक्षिका के रूप में काम किया।
कोलकाता में बदली जीवन की दिशा
शिक्षिका के रूप में काम करते हुए मदर टेरेसा ने कोलकाता में गरीबी और वंचित लोगों की कठिन परिस्थितियों को करीब से देखा। वर्ष 1946 में उन्हें गरीबों के बीच जाकर काम करने की प्रेरणा मिली।
इसके बाद उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अपने सुरक्षित जीवन से आगे बढ़कर झुग्गी-बस्तियों और जरूरतमंद लोगों के बीच सेवा का रास्ता चुना।
मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना
वर्ष 1950 में मदर टेरेसा ने मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना की। इसका उद्देश्य ऐसे लोगों की मदद करना था जिन्हें समाज में सहारे और संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ता था।
धीरे-धीरे संगठन का काम भारत के अन्य हिस्सों में फैला और बाद में दूसरे देशों तक पहुंचा। संस्था ने अनाथ बच्चों, बेघर लोगों, गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों और अंतिम अवस्था में पहुंचे लोगों की देखभाल जैसे कार्य किए।
निर्मल हृदय से मिली पहचान
कोलकाता में उनकी प्रमुख पहलों में ‘निर्मल हृदय’ का नाम लिया जाता है। यहां ऐसे लोगों को देखभाल और सहारा देने की कोशिश की जाती थी, जो जीवन के अंतिम चरण में थे और जिनके पास पर्याप्त पारिवारिक या सामाजिक सहायता नहीं थी।
इस काम ने मदर टेरेसा को भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाई।
1979 में नोबेल शांति पुरस्कार
गरीब और पीड़ित लोगों के बीच किए गए उनके कार्यों के लिए वर्ष 1979 में मदर टेरेसा को नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया।
पुरस्कार मिलने के बाद उनकी वैश्विक पहचान और मजबूत हुई। उन्होंने अपने संगठन के माध्यम से सेवा गतिविधियों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।
भारत रत्न से भी सम्मानित
भारत सरकार ने वर्ष 1980 में मदर टेरेसा को भारत रत्न से सम्मानित किया। इससे पहले और बाद में उन्हें कई राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी मिले।
भारत में उनकी पहचान खास तौर पर कोलकाता और गरीबों के बीच किए गए उनके लंबे सेवा कार्य से बनी।
उनके काम की आलोचना भी हुई
मदर टेरेसा के काम को जहां बड़े स्तर पर सराहना मिली, वहीं कुछ आलोचकों ने उनके संस्थानों की चिकित्सा व्यवस्था, गरीबी और पीड़ा के प्रति उनके दृष्टिकोण तथा धार्मिक गतिविधियों को लेकर सवाल भी उठाए।
कुछ आलोचनाओं में संस्थाओं को मिलने वाले धन और उसकी पारदर्शिता को लेकर भी प्रश्न उठे। मिशनरीज ऑफ चैरिटी ने अलग-अलग मौकों पर अपने काम और सेवा के उद्देश्यों का बचाव किया।
धार्मिक आस्था और सेवा
मदर टेरेसा के लिए जरूरतमंदों की सेवा उनकी धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। वह गरीबों और बीमार लोगों की मदद को मानवीय करुणा के साथ-साथ धार्मिक जिम्मेदारी के रूप में देखती थीं।
उनके समर्थकों ने इसी सोच को उनकी सेवा का आधार माना, जबकि आलोचकों ने उनके धार्मिक दृष्टिकोण पर अलग राय रखी।
1997 में हुआ निधन
मदर टेरेसा का निधन 5 सितंबर 1997 को कोलकाता में हुआ। उनके निधन के बाद भारत सहित दुनिया के कई हिस्सों में उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। भारत में उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया गया।
उनके निधन के बाद भी मिशनरीज ऑफ चैरिटी ने उनकी सेवा परंपरा को जारी रखा।
संत टेरेसा ऑफ कोलकाता बनीं
मदर टेरेसा के निधन के बाद कैथोलिक चर्च में उन्हें संत घोषित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। वर्ष 2003 में पोप जॉन पॉल द्वितीय ने उन्हें धन्य घोषित किया।
इसके बाद 4 सितंबर 2016 को पोप फ्रांसिस ने वेटिकन सिटी में उन्हें संत टेरेसा ऑफ कोलकाता घोषित किया।
सेवा की विरासत आज भी कायम
मदर टेरेसा की विरासत को लेकर अलग-अलग विचार मौजूद हैं। उनके समर्थक उन्हें गरीब और बेसहारा लोगों के लिए जीवन समर्पित करने वाली मानवतावादी शख्सियत मानते हैं, जबकि आलोचक उनके काम के कुछ पहलुओं और धार्मिक दृष्टिकोण पर सवाल उठाते रहे हैं।
इसके बावजूद उनकी जीवन यात्रा ने दुनिया का ध्यान समाज के उन वर्गों की ओर खींचा, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा से बाहर समझा जाता है। भारत में शुरू हुई उनकी सेवा गतिविधियां आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचीं और मिशनरीज ऑफ चैरिटी आज भी विभिन्न क्षेत्रों में जरूरतमंद लोगों के लिए काम करती है।
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