प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन से आदिवासियों के लिए खुल रहे वन अर्थव्यवस्था में आय के नए रास्ते

प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन के जरिए आदिवासी समुदायों को वन आधारित अर्थव्यवस्था से जोड़कर आय, रोजगार और आजीविका के नए अवसर उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है।

Aug 20, 2026 - 13:42
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प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन से आदिवासियों के लिए खुल रहे वन अर्थव्यवस्था में आय के नए रास्ते
प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन से आदिवासियों के लिए खुल रहे वन अर्थव्यवस्था में आय के नए रास्ते

भारत में बड़ी संख्या में आदिवासी परिवारों की आजीविका जंगलों से मिलने वाले लघु वन उपज पर निर्भर है। शहद, महुआ, इमली, तेंदू पत्ते, बांस, लाख और औषधीय पौधों जैसी वन उपज से कई परिवारों को अपनी सालाना आमदनी का महत्वपूर्ण हिस्सा मिलता है। हालांकि, बाजार तक सीधी पहुंच और उचित कीमत नहीं मिलने के कारण लंबे समय से आदिवासी संग्रहकर्ताओं को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता रहा है।

इसी समस्या को दूर करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन (PMJVM) के माध्यम से वन आधारित आजीविका को मजबूत करने पर जोर दे रही है। योजना के तहत आदिवासी संग्रहकर्ताओं को वन धन विकास केंद्रों (VDVK) से जोड़ा जा रहा है, ताकि वे केवल कच्ची वन उपज बेचने तक सीमित न रहें बल्कि उसका प्रसंस्करण, पैकेजिंग और मूल्यवर्धन करके अधिक आमदनी हासिल कर सकें।

लघु वन उपज से जुड़ी है बड़ी आबादी की आजीविका

लघु वन उपज आदिवासी क्षेत्रों में आय का अहम स्रोत है। शहद, महुआ के फूल, तेंदू पत्ते, इमली, लाख, बांस और जंगली जड़ी-बूटियों की मांग बाजार में बनी रहती है। लेकिन बिचौलियों की वजह से कई बार संग्रहकर्ताओं को उनकी उपज का उचित बाजार मूल्य नहीं मिल पाता।

सरकार की कोशिश है कि संग्रहकर्ताओं को संगठित करके उन्हें बेहतर बाजार, प्रशिक्षण और प्रसंस्करण सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। इसके साथ ही निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य के माध्यम से भी कई वन उपज के लिए बेहतर मूल्य सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है।

वन धन केंद्रों के जरिए बदल रही पुरानी व्यवस्था

प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन के तहत आदिवासी समूहों को आधुनिक तकनीक, प्रसंस्करण और व्यवसाय प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जाता है। इसका लक्ष्य वन उपज को तैयार उत्पाद में बदलकर उसकी बाजार कीमत बढ़ाना है।

वन धन विकास केंद्रों के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों को संगठित किया जाता है। इन केंद्रों में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध वन उपज के अनुसार सफाई, छंटाई, सुखाने, प्रसंस्करण और पैकेजिंग के लिए जरूरी उपकरण उपलब्ध कराने की व्यवस्था है।

वन अधिकार कानून से मिले वन उपज के अधिकार

वन अधिकार अधिनियम, 2006 ने वन क्षेत्रों में रहने वाले पात्र आदिवासी और पारंपरिक वन निवासियों के लघु वन उपज से जुड़े अधिकारों को मान्यता दी है। बांस, शहद, मोम, लाख, तेंदू पत्ते, औषधीय पौधे, जड़ और कंद समेत कई गैर-काष्ठ वन उत्पाद इसके दायरे में आते हैं।

इसके अलावा अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायतों से संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत भी ग्राम स्तर पर लघु वन उपज से जुड़े अधिकारों को मजबूत किया गया है।

87 वन उपज के लिए एमएसपी

सरकार ने योजना के तहत 87 लघु वन उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित किया है। इसका उद्देश्य आदिवासी संग्रहकर्ताओं को बाजार में होने वाले मूल्य उतार-चढ़ाव और बिचौलियों पर निर्भरता से राहत देना है।

ट्राइफेड निभा रहा अहम भूमिका

भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास संघ यानी ट्राइफेड आदिवासी उत्पादों के विकास और विपणन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके जरिए राज्य स्तर की एजेंसियों, जनजातीय सहकारी संस्थाओं और अन्य संबंधित संगठनों के नेटवर्क से वन उपज की खरीद और विपणन को आगे बढ़ाया जाता है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2013-14 से राज्य सरकारों ने योजना के तहत बड़ी मात्रा में लघु वन उपज की खरीद की है। इससे आदिवासी उत्पादकों को संगठित बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में मदद मिली है।

4,172 वन धन विकास केंद्र स्वीकृत

31 जुलाई 2026 तक प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन के अंतर्गत 4,172 वन धन विकास केंद्रों को मंजूरी दी जा चुकी है। इनमें 2,911 केंद्र सक्रिय हैं। इन केंद्रों से करीब 12.48 लाख जनजातीय सदस्य जुड़े हुए हैं और केंद्रों की कुल बिक्री लगभग 168 करोड़ रुपये बताई गई है।

महिलाओं को मिल रहा आर्थिक सशक्तिकरण का अवसर

वन उपज के संग्रह और प्राथमिक प्रसंस्करण में महिलाओं की बड़ी भागीदारी रहती है। वन धन विकास केंद्रों के जरिए महिलाओं को सामुदायिक उद्यमों से जोड़ने पर भी जोर दिया जा रहा है। इससे वे केवल वन उपज संग्रह करने वाली श्रमिक न रहकर उत्पादन, प्रसंस्करण और कारोबार में भागीदार बन सकती हैं।

अरुणाचल प्रदेश के लेपराडा जिले का उदाहरण इसका एक उदाहरण है। वहां महिला स्वयं सहायता समूहों से जुड़े सदस्यों ने स्थानीय कृषि और वन उत्पादों से अचार, मसाले, जैम और स्क्वैश जैसे मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार किए। इससे स्थानीय महिलाओं को अपनी पारंपरिक आजीविका के साथ अतिरिक्त और सालभर आय अर्जित करने का अवसर मिला।

स्थानीय बाजार से ई-कॉमर्स तक पहुंच

सरकार वन धन केंद्रों को स्थानीय हाट और प्राथमिक वन उपज खरीद केंद्रों से जोड़ने के साथ डिजिटल बाजार तक पहुंच बढ़ाने पर भी काम कर रही है। उत्पादों की ब्रांडिंग, पैकेजिंग, प्रदर्शनियों और मेलों के जरिए प्रचार तथा ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

इसके अलावा जनजातीय उत्पादों के लिए भौगोलिक संकेतक, डिजिटल तकनीक और जियो-टैगिंग जैसी व्यवस्थाओं को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे स्थानीय उत्पादों की पहचान और बाजार पहुंच मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

वन आधारित अर्थव्यवस्था को मिल रहा नया आधार

प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन का जोर आदिवासी समुदायों को जंगल से मिलने वाले संसाधनों का बेहतर आर्थिक इस्तेमाल करने में सक्षम बनाने पर है। कच्ची वन उपज को तैयार उत्पाद में बदलने, बेहतर कीमत दिलाने और बाजार से सीधे जोड़ने से आदिवासी परिवारों की आय बढ़ाने की संभावनाएं बन रही हैं।

सामुदायिक भागीदारी, पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक बाजार व्यवस्था को एक साथ जोड़ने की यह पहल आदिवासी क्षेत्रों में टिकाऊ आजीविका और स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा दे सकती है। साथ ही, इससे जनजातीय समुदायों की आर्थिक भागीदारी को व्यापक विकास प्रक्रिया से जोड़ने में मदद मिल सकती है।

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