UN में भारत की मांग: आतंकवाद को मानवता के खिलाफ अपराध माना जाए

भारत ने संयुक्त राष्ट्र में कहा है कि आतंकवादियों के ऐसे गंभीर अपराध, जो निर्धारित कानूनी मानकों को पूरा करते हैं, उन्हें मानवता के खिलाफ अपराधों की प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय संधि में शामिल किया जाना चाहिए। भारत ने राष्ट्रीय संप्रभुता और देशों के अधिकार क्षेत्र के सम्मान पर भी जोर दिया।

Oct 13, 2026 - 08:58
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UN में भारत की मांग: आतंकवाद को मानवता के खिलाफ अपराध माना जाए

नई दिल्ली: भारत ने संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद से जुड़े गंभीर अपराधों को मानवता के खिलाफ अपराधों की रोकथाम और सजा से संबंधित प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय संधि में शामिल करने की मांग उठाई है। भारत का कहना है कि आतंकवादी गतिविधियों की गंभीरता और उनके व्यापक मानवीय प्रभाव को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचे में उचित प्रावधान होने चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र में भारत ने क्या कहा?

संयुक्त राष्ट्र महासभा की छठी समिति की बैठक में भारत की प्रतिनिधि आर. मैथिली ने कहा कि आतंकवादियों के ऐसे अपराध और अत्याचार, जो निर्धारित कानूनी मानकों को पूरा करते हैं, उन्हें मानवता के खिलाफ अपराधों के दायरे में शामिल किया जाना चाहिए।

छठी समिति अंतरराष्ट्रीय कानूनी मामलों पर विचार करती है। यहां मानवता के खिलाफ अपराधों की रोकथाम और दोषियों को सजा देने के लिए प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय समझौते पर चर्चा हो रही है।

आतंकवाद के गंभीर प्रभावों पर जोर

भारत ने कहा कि आतंकवादी गतिविधियों से लोगों के जीवन और सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ता है। इसलिए प्रस्तावित संधि में आतंकवाद से जुड़े उन कृत्यों पर भी विचार किया जाना चाहिए, जो मानवता के खिलाफ अपराधों की कानूनी कसौटी पर खरे उतरते हैं।

भारत के अनुसार, केवल मौजूदा कानूनी व्यवस्थाओं को नए समझौते में शामिल कर देना पर्याप्त नहीं होगा। संधि का उद्देश्य अपराधों की रोकथाम और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कानूनी आधार तैयार करना भी होना चाहिए।

राष्ट्रीय कानून और देशों की जिम्मेदारी अहम

भारत ने इस बात पर जोर दिया कि मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघनों और बड़े पैमाने पर होने वाले अत्याचारों के मामलों में न्याय सुनिश्चित करने की प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित देशों की है।

भारत का मानना है कि प्रस्तावित संधि में इस सिद्धांत को मजबूत किया जाना चाहिए। इसके साथ ही अपराधों की जांच और अभियोजन के दौरान आरोपी के अधिकारों तथा पीड़ितों के हितों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

संप्रभुता और अधिकार क्षेत्र पर भारत का रुख

भारत ने कहा कि मानवता के खिलाफ अपराधों को रोकने और दोषियों को सजा देने के लिए उठाए जाने वाले कदमों में देशों की संप्रभुता और उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने के सिद्धांत का सम्मान होना चाहिए।

भारत ने राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र की प्राथमिकता पर भी जोर दिया। इस दृष्टिकोण के अनुसार, न्याय सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाते समय देशों की कानूनी प्रणालियों और जिम्मेदारियों को उचित महत्व दिया जाना चाहिए।

2028 से शुरू होगी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन प्रक्रिया

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मानवता के खिलाफ अपराधों की रोकथाम और सजा के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय समझौता तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की है। इसके तहत सम्मेलन 2028 और 2029 में न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित करने की योजना है। <Cite refs={["turn965395search4","turn965395search8"]}/>

इस प्रक्रिया के तहत तैयारी समिति का पहला सत्र 19 से 30 जनवरी 2026 तक आयोजित हुआ था। दूसरा सत्र 12 से 15 अप्रैल 2027 के लिए निर्धारित है। <Cite refs={["turn965395search1"]}/>

भारत की मांग इस बात पर केंद्रित है कि प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था में आतंकवाद से जुड़े गंभीर अपराधों को भी उचित स्थान मिले। हालांकि, किसी आतंकवादी कृत्य को मानवता के खिलाफ अपराध मानने के लिए संबंधित कानूनी मानकों और परिस्थितियों का आकलन आवश्यक होगा।

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