Kautilya Economic Conclave 2026: उपराष्ट्रपति बोले- आर्थिक लचीलेपन के लिए जरूरी है समावेशी विकास
उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने पांचवें कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में कहा कि बदलते वैश्विक माहौल में भारत को लचीली, समावेशी और उत्तरदायी आर्थिक नीतियों की जरूरत है।
नई दिल्ली: उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने शनिवार को नई दिल्ली में पांचवें कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि तेजी से बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच भारत की आर्थिक नीतियां लचीली, समावेशी और परिस्थितियों के अनुरूप बदलाव करने वाली होनी चाहिए। सम्मेलन का विषय ‘Resilience in an Age of Flux’ रखा गया है और इसका आयोजन 3 से 5 अक्टूबर तक किया जा रहा है।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि आर्थिक मजबूती को सामाजिक मजबूती से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उनके अनुसार वास्तविक लचीलापन तभी तैयार होगा, जब विकास की प्रक्रिया में नागरिकों, उद्यमों और अलग-अलग क्षेत्रों को पीछे न छूटने दिया जाए।
बदलती परिस्थितियों में समावेशन को बताया जरूरी
नीति निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों, शिक्षाविदों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि वर्तमान वैश्विक माहौल में आर्थिक नीतियों का संबंध जमीनी परिस्थितियों से होना चाहिए। उन्होंने समावेशन को आर्थिक लचीलेपन की महत्वपूर्ण आधारशिला बताया और कहा कि विकास का लाभ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचना जरूरी है।
जमीनी अनुभवों पर आधारित हो नीति निर्माण
उपराष्ट्रपति ने इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ (IEG) की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्थान की स्थापना 1952 में प्रोफेसर वी. के. आर. वी. राव के नेतृत्व में हुई थी। उन्होंने कहा कि प्रभावी नीति निर्माण के लिए देश की वास्तविक परिस्थितियों और लोगों की जरूरतों को समझना आवश्यक है। बदलती परिस्थितियों के साथ नीतियों में भी आवश्यक बदलाव की क्षमता होनी चाहिए।
लोकतांत्रिक चर्चा के साथ निर्णय लेने पर जोर
सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि लोकतंत्र में बहस और विचार-विमर्श जरूरी हैं, लेकिन इनका उद्देश्य व्यापक सहमति वाले निर्णयों तक पहुंचना होना चाहिए। राज्यसभा के सभापति के रूप में अपने अनुभव का उल्लेख करते हुए उन्होंने स्वतंत्र और पारदर्शी चर्चा को लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बताया।
उन्होंने यह भी कहा कि अधिकारों और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए आवश्यक है।
लोकतंत्र के साथ आर्थिक विकास संभव
उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत ने यह दिखाया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर आर्थिक विकास और समावेशी प्रगति को आगे बढ़ाया जा सकता है। उनके अनुसार व्यापक सहमति ने आर्थिक सुधारों को स्थिरता और निरंतरता देने में भूमिका निभाई है। उन्होंने इसे 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण आधार बताया।
जनधन, DBT और GST का किया उल्लेख
अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने वित्तीय समावेशन और औपचारिक अर्थव्यवस्था के विस्तार के संदर्भ में जनधन खातों, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और GST का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि अगस्त 2026 तक देश में 590 मिलियन से अधिक जनधन खाते खोले जा चुके हैं। वहीं, GST पंजीकरण की संख्या 2017 के करीब 6.65 मिलियन से बढ़कर मई 2026 में लगभग 16.5 मिलियन हो गई।
समावेशन का मतलब उद्यमिता के अवसर भी
राधाकृष्णन ने कहा कि आर्थिक समावेशन केवल लोगों को औपचारिक व्यवस्था से जोड़ने तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसके साथ लोगों को आय अर्जित करने, मूल्य सृजित करने और अपना कारोबार शुरू करने के अवसर भी मिलने चाहिए।
उन्होंने ग्रामीण महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे समूह जमीनी स्तर पर आर्थिक गतिविधियों और आत्मनिर्भरता को बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं।
महिला भागीदारी से बदल रहा आर्थिक परिदृश्य
उपराष्ट्रपति ने कहा कि शिक्षा और आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी भारत में महिला सशक्तिकरण से महिला नेतृत्व वाले विकास की ओर बदलाव का संकेत है। उन्होंने कहा कि जब ग्रामीण महिला बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ती है, उसे सरकारी सहायता सीधे मिलती है और वह स्वयं सहायता समूह के माध्यम से आर्थिक गतिविधि शुरू करती है, तो इससे स्थानीय स्तर पर आर्थिक मजबूती बढ़ती है।
गरीबी में कमी का भी किया उल्लेख
उन्होंने कहा कि 250 मिलियन से अधिक भारतीय अत्यधिक गरीबी से बाहर आए हैं। उपराष्ट्रपति ने कहा कि विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते समय देश के प्रत्येक राज्य, जिले और गांव को विकास यात्रा में भागीदार बनाना आवश्यक है।
शोध और संस्थागत सहयोग बढ़ाने की अपील
उपराष्ट्रपति ने आर्थिक नीति निर्माण में शोध और संस्थागत सहयोग की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ के बीच सहयोग का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि भारत के बढ़ते अंतरराष्ट्रीय व्यापार और आर्थिक संबंधों के साथ ऐसे शैक्षणिक एवं शोध सहयोग से अनुसंधान, शिक्षा, नवाचार और उद्यमिता को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
बदलाव को अपनाने से बनेगा आर्थिक लचीलापन
अपने संबोधन के अंत में सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि भारत का लचीलापन बदलाव का विरोध करने में नहीं, बल्कि उसे आत्मविश्वास, समावेशन और सामूहिक प्रयास के साथ अपनाने में है। उन्होंने उम्मीद जताई कि कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में होने वाली चर्चाएं 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में नीति निर्माण और विचार-विमर्श को नई दिशा देंगी।
सम्मेलन में IEG के अध्यक्ष और बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज के सदस्य एन. के. सिंह, बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के चेयरमैन डॉ. माइकल देबब्रत पात्रा समेत कई अन्य विशेषज्ञ और गणमान्य लोग मौजूद रहे। सम्मेलन में वैश्विक आर्थिक बदलाव, व्यापार, निवेश, तकनीक, वित्त और भारत की आर्थिक प्राथमिकताओं पर चर्चा हो रही है।
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