पीयूष गोयल ने जलवायु वित्त पर उठाए सवाल, CBAM पर यूरोपीय संघ को घेरा
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में विकसित देशों से जलवायु वित्त की प्रतिबद्धताएं पूरी करने की मांग की। उन्होंने 100 अरब डॉलर के पुराने लक्ष्य, यूरोपीय संघ के CBAM और भारत के प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन का मुद्दा उठाया।
केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विकसित देशों की जिम्मेदारी और उनके वित्तीय योगदान पर सवाल उठाए हैं। बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में आयोजित एक राउंडटेबल के दौरान उन्होंने कहा कि विकसित देशों और यूरोपीय संघ को ग्लोबल साउथ के देशों के लिए किए गए जलवायु वित्त संबंधी वादों को पूरा करना चाहिए।
पीयूष गोयल ने तर्क दिया कि ऐतिहासिक रूप से विकसित देशों का वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में बड़ा योगदान रहा है। इसके बावजूद विकासशील और कमजोर देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धताओं पर सवाल बने हुए हैं।
पेरिस जलवायु समझौते के तहत 100 अरब डॉलर के वादे का जिक्र
वाणिज्य मंत्री ने 2015 के पेरिस जलवायु सम्मेलन (COP21) का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय विकसित देशों की ओर से विकासशील देशों की मदद के लिए जलवायु वित्त उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता जताई गई थी। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका का जिक्र करते हुए कहा कि भारत ने ग्लोबल साउथ के देशों की चिंताओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया।
गोयल के अनुसार, विकसित देशों से उम्मीद थी कि वे विकासशील देशों, कम विकसित देशों और छोटे द्वीपीय देशों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने तथा उत्सर्जन घटाने में सहायता देंगे। उन्होंने इस संदर्भ में सालाना 100 अरब डॉलर जुटाने के पुराने लक्ष्य का उल्लेख किया।
11 साल बाद भी जलवायु वित्त पर सवाल
पीयूष गोयल ने जलवायु वित्त की प्रतिबद्धताओं को लागू करने में हुई देरी पर असंतोष जताया। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को किए गए वादों और जमीन पर उपलब्ध सहायता के बीच अंतर बना हुआ है।
उन्होंने यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) पर भी सवाल उठाए। यह व्यवस्था कुछ आयातित वस्तुओं के उत्पादन के दौरान होने वाले कार्बन उत्सर्जन से जुड़ी है। गोयल ने जलवायु वित्त और व्यापार संबंधी नीतियों के बीच संतुलन की जरूरत पर जोर दिया।
जलवायु वित्त को लेकर विकसित देशों की प्रतिबद्धताओं का इतिहास 2009 के कोपेनहेगन जलवायु सम्मेलन (COP15) तक जाता है। उस समय विकसित देशों ने 2020 तक विकासशील देशों के लिए हर साल 100 अरब डॉलर जुटाने का लक्ष्य रखा था। बाद में पेरिस समझौते के तहत इस लक्ष्य को 2025 तक जारी रखने पर सहमति बनी।
भारत और यूरोप के प्रति व्यक्ति उत्सर्जन की तुलना
अपने संबोधन में गोयल ने भारत और यूरोप के बीच जनसंख्या तथा कार्बन उत्सर्जन के अंतर को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया की लगभग 17 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उसका हिस्सा 3 प्रतिशत से कम है।
उन्होंने दावा किया कि भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन फुटप्रिंट यूरोप के मुकाबले काफी कम है। उनके अनुसार, जलवायु परिवर्तन पर चर्चा करते समय देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी, जनसंख्या और प्रति व्यक्ति उत्सर्जन को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
गोयल ने कचरे के प्रबंधन और सर्कुलर इकोनॉमी के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि जलवायु नीति बनाते समय विकासशील देशों की परिस्थितियों और जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
विकास के साथ स्वच्छ ऊर्जा पर भारत का जोर
पीयूष गोयल ने कहा कि भारत के सामने 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा, भोजन और सुरक्षा संबंधी जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी है। इन आवश्यकताओं के बावजूद देश स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार और उत्सर्जन कम करने के प्रयासों में तेजी ला रहा है।
उन्होंने भारत के हरित ऊर्जा कार्यक्रमों का उल्लेख करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सभी देशों को अपनी क्षमताओं और परिस्थितियों के अनुरूप योगदान देना चाहिए। उनके मुताबिक, वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने के लिए विकासशील देशों को वित्तीय और तकनीकी सहायता देना भी जरूरी है।
पीयूष गोयल का संदेश था कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी साझा होनी चाहिए, लेकिन देशों के ऐतिहासिक उत्सर्जन, विकास की जरूरतों और उपलब्ध संसाधनों के अंतर को भी अंतरराष्ट्रीय नीतियों में उचित महत्व मिलना चाहिए।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)