पीएम मोदी ने साझा किया राजा भोज का संस्कृत श्लोक, जानें इसका अर्थ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर राजा भोज के ग्रंथ ‘समराङ्गणसूत्रधार’ का संस्कृत सुभाषित साझा किया। श्लोक में शास्त्रज्ञान, विवेक, अच्छे आचरण, कार्यकुशलता और लक्ष्य के प्रति निष्ठा का महत्व बताया गया है।

Oct 30, 2026 - 10:03
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पीएम मोदी ने साझा किया राजा भोज का संस्कृत श्लोक, जानें इसका अर्थ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को सोशल मीडिया पर संस्कृत का एक सुभाषित साझा किया। इस श्लोक के जरिए उन्होंने शास्त्रों के ज्ञान, विवेक, नैतिक आचरण और व्यावहारिक कार्यकुशलता के बीच तालमेल का संदेश दिया। प्रधानमंत्री की ओर से साझा किया गया यह श्लोक मालवा के राजा भोज के प्रसिद्ध वास्तुशास्त्र ग्रंथ ‘समराङ्गणसूत्रधार’ से लिया गया है।

पीएम मोदी ने साझा किया संस्कृत सुभाषित

प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया पर यह श्लोक साझा किया:

“शास्त्रं कर्म तथा प्रज्ञा शीलं क्रिययान्वितम्।

लक्ष्यलक्षणयुक्तार्थशास्त्रनिष्ठो नरो भवेत्॥”

इसका भावार्थ है कि व्यक्ति की वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब उसके पास शास्त्रों का ज्ञान, सही निर्णय लेने की क्षमता, अच्छा चरित्र और काम करने की दक्षता हो। केवल ज्ञान हासिल करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे व्यवहार में उतारना और अपने लक्ष्य की दिशा में प्रभावी ढंग से काम करना भी जरूरी है।

राजा भोज के ग्रंथ ‘समराङ्गणसूत्रधार’ से लिया गया श्लोक

यह सुभाषित मालवा के राजा भोज की ओर से रचित प्रसिद्ध वास्तुशास्त्र ग्रंथ ‘समराङ्गणसूत्रधार’ के 44वें अध्याय के दूसरे श्लोक से संबंधित है। इसमें एक योग्य वास्तुविद के आवश्यक गुणों का वर्णन किया गया है।

ग्रंथ के अनुसार, कुशल वास्तुविद के पास व्यावहारिक काम का अनुभव, तेज बुद्धि और सूझबूझ होनी चाहिए। इसके साथ ही उसका आचरण अच्छा और अपने कार्य के प्रति समर्पण भी जरूरी है।

ज्ञान के साथ अच्छे आचरण और कर्म पर जोर

श्लोक का मूल संदेश है कि सच्चा ज्ञानी वही है, जिसके विचार और व्यवहार में एकरूपता हो। उसके पास शास्त्रों का ज्ञान और प्रज्ञा यानी विवेक तो हो, लेकिन उसका चरित्र और कर्म भी उसी ज्ञान के अनुरूप होने चाहिए।

राजा भोज ने इस विचार के जरिए बताया है कि किसी व्यक्ति की योग्यता केवल किताबी ज्ञान से तय नहीं होती। उसे सिद्धांतों की सही समझ के साथ व्यावहारिक परिस्थितियों में उनका उपयोग करना भी आना चाहिए।

लक्ष्य और सिद्धांतों के प्रति निष्ठा जरूरी

इस सुभाषित में लक्ष्य, उसके सही तौर-तरीकों और शास्त्रीय सिद्धांतों के प्रति निष्ठा को भी महत्वपूर्ण बताया गया है। इसका व्यापक अर्थ है कि व्यक्ति को अपने उद्देश्य की स्पष्ट समझ रखनी चाहिए और उसे हासिल करने के लिए विवेक, नैतिकता तथा प्रभावी कार्यान्वयन का सहारा लेना चाहिए।

इस तरह प्रधानमंत्री की ओर से साझा किया गया यह श्लोक ज्ञान और कर्म के संतुलन, श्रेष्ठ आचरण तथा लक्ष्य के प्रति समर्पण का संदेश देता है।

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