World Rabies Day 2026: रेबीज से बचाव संभव, जानें काटने पर क्या करें

World Rabies Day 2026 पर जानें रेबीज के लक्षण, कुत्ते के काटने पर तुरंत क्या करना चाहिए, PEP कैसे बचाता है जान और कुत्तों का टीकाकरण क्यों जरूरी है।

Sep 28, 2026 - 09:37
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World Rabies Day 2026: रेबीज से बचाव संभव, जानें काटने पर क्या करें

हर साल 28 सितंबर को विश्व रेबीज दिवस (World Rabies Day) मनाया जाता है। रेबीज ऐसी संक्रामक बीमारी है, जिससे बचाव के लिए प्रभावी वैक्सीन और उपचार उपलब्ध हैं, लेकिन लक्षण सामने आने के बाद यह बीमारी लगभग हमेशा जानलेवा साबित होती है। इसके बावजूद संक्रमण के तुरंत बाद सही उपचार मिलने पर रेबीज से होने वाली मौत को रोका जा सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार रेबीज 150 से अधिक देशों और क्षेत्रों में मौजूद है और हर साल लगभग 59 हजार लोगों की मौत इससे होती है। बच्चों पर इसका असर विशेष रूप से गंभीर है। वर्ष 2026 के विश्व रेबीज दिवस की थीम “Stronger Together” है, जो बीमारी के खिलाफ मानव और पशु स्वास्थ्य से जुड़े विभागों के सामूहिक प्रयासों पर जोर देती है।

रेबीज क्या है?

रेबीज एक वायरल जूनोटिक बीमारी है, जो मुख्य रूप से मस्तिष्क और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है। संक्रमित पशु की लार के संपर्क से वायरस इंसान तक पहुंच सकता है। कुत्ते इसके संक्रमण का सबसे प्रमुख स्रोत हैं।

काटने या खरोंचने के अलावा संक्रमित लार का खुले घाव या आंख, नाक और मुंह जैसी श्लेष्मा झिल्लियों के संपर्क में आना भी जोखिम पैदा कर सकता है।

शुरुआती चरण में बुखार, बेचैनी, दर्द या काटे गए स्थान के आसपास झनझनाहट और जलन जैसे लक्षण हो सकते हैं। बाद में बीमारी बढ़ने पर निगलने में कठिनाई, भ्रम, उत्तेजना, पानी से डर जैसी स्थिति या लकवा और कोमा हो सकता है।

सबसे अहम बात यह है कि लक्षण आने के बाद रेबीज लगभग हमेशा घातक होती है। इसलिए संक्रमण के बाद बीमारी के लक्षणों का इंतजार करना खतरनाक हो सकता है।

लुई पाश्चर से आधुनिक वैक्सीन तक

रेबीज के खिलाफ विज्ञान की लड़ाई में फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुई पाश्चर का योगदान ऐतिहासिक रहा है। 1885 में उनके विकसित किए गए रेबीज वैक्सीन का एक बच्चे पर सफल प्रयोग किया गया था।

आज रेबीज की रोकथाम के लिए आधुनिक सेल-कल्चर आधारित वैक्सीन उपलब्ध हैं। चिकित्सा विज्ञान ने इस बीमारी से बचाव के प्रभावी साधन विकसित कर लिए हैं। अब बड़ी चुनौती इन सुविधाओं को समय पर और समान रूप से जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने की है।

इंसानों में रेबीज का सबसे बड़ा स्रोत कुत्ते

WHO के मुताबिक इंसानों में रेबीज के लगभग 99 प्रतिशत मामले कुत्तों से जुड़े होते हैं। इसलिए मानव रेबीज को नियंत्रित करने के लिए कुत्तों में संक्रमण को रोकना बेहद महत्वपूर्ण है।

इसका मतलब यह नहीं है कि हर कुत्ते के काटने से रेबीज होगा। लेकिन संभावित जोखिम को देखते हुए किसी भी संदिग्ध काटने या खरोंच के बाद व्यक्ति को स्वयं फैसला लेने के बजाय तुरंत स्वास्थ्यकर्मी से सलाह लेनी चाहिए।

बच्चों को क्यों रखना चाहिए विशेष सावधानी?

रेबीज से होने वाली मौतों में बच्चों की हिस्सेदारी काफी अधिक है। WHO के अनुसार लगभग 40 प्रतिशत पीड़ित 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे होते हैं।

बच्चे अक्सर अनजान पशुओं के करीब चले जाते हैं या उन्हें खेलते समय छेड़ देते हैं। इसलिए बच्चों को सिखाना जरूरी है कि अनजान कुत्तों और अन्य पशुओं को न छेड़ें, उन्हें भोजन करते समय परेशान न करें और उनके बच्चों के पास जाने से बचें।

किसी पशु के काटने या खरोंचने की घटना को छिपाना भी नहीं चाहिए। बच्चे को तुरंत माता-पिता, शिक्षक या किसी जिम्मेदार व्यक्ति को इसकी जानकारी देनी चाहिए।

कुत्ते के काटने पर सबसे पहले क्या करें?

रेबीज से बचाव में काटे जाने के तुरंत बाद उठाया गया कदम बेहद महत्वपूर्ण है। WHO के अनुसार घाव को साबुन और बहते पानी से लगभग 15 मिनट तक अच्छी तरह धोना चाहिए।

इसके बाद जल्द से जल्द स्वास्थ्य केंद्र पहुंचकर चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

घाव पर मिट्टी, तेल, मिर्च, राख, चूना या कोई अन्य घरेलू पदार्थ लगाने से बचना चाहिए। चोट छोटी दिखाई दे या खून कम निकले, तब भी संभावित जोखिम को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

PEP है जीवन बचाने वाला उपाय

रेबीज के संभावित संपर्क के बाद Post-Exposure Prophylaxis (PEP) बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें घाव की सफाई, आवश्यकतानुसार रेबीज वैक्सीन और कुछ गंभीर एक्सपोजर में रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन शामिल हो सकते हैं।

किस व्यक्ति को किस तरह का उपचार चाहिए, इसका निर्णय स्वास्थ्यकर्मी एक्सपोजर की प्रकृति और जोखिम के आधार पर करते हैं। इसलिए किसी भी काटने या खरोंच की स्थिति में खुद से वैक्सीन लेने या न लेने का फैसला नहीं करना चाहिए।

कुत्तों का टीकाकरण सबसे प्रभावी रणनीतियों में शामिल

मानव रेबीज को नियंत्रित करने के लिए बड़े पैमाने पर कुत्तों का टीकाकरण सबसे महत्वपूर्ण उपायों में से एक है। कुत्तों में वायरस का प्रसार जितना कम होगा, इंसानों तक संक्रमण पहुंचने का खतरा भी उतना ही कम होगा।

इसलिए रेबीज नियंत्रण में केवल इंसानों को PEP उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। पशुओं में टीकाकरण, निगरानी और आबादी प्रबंधन को भी समान महत्व देना जरूरी है।

पालतू पशु पालने वालों की जिम्मेदारी

पालतू कुत्ते का नियमित टीकाकरण कराना जिम्मेदार पशु-पालन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पशु के स्वास्थ्य की नियमित जांच, टीकाकरण रिकॉर्ड सुरक्षित रखना और उसके व्यवहार में अचानक बदलाव आने पर पशु चिकित्सक से संपर्क करना भी जरूरी है।

यदि पालतू पशु किसी व्यक्ति को काटता है तो उसका टीकाकरण रिकॉर्ड चिकित्सकीय जोखिम आकलन में उपयोगी हो सकता है।

आवारा कुत्तों के प्रबंधन में वैज्ञानिक तरीका जरूरी

शहरी क्षेत्रों में आवारा कुत्तों की आबादी का प्रबंधन सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ-साथ पशु कल्याण से भी जुड़ा विषय है। इसका समाधान केवल कुत्तों को हटाने तक सीमित नहीं हो सकता।

रेबीज नियंत्रण के लिए बड़े पैमाने पर एंटी-रेबीज टीकाकरण, वैज्ञानिक आबादी प्रबंधन, कचरा प्रबंधन और समुदाय की भागीदारी आवश्यक है। Animal Birth Control जैसे कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करना भी महत्वपूर्ण है।

भारत में रेबीज की चुनौती

भारत में रेबीज एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है। देश में मानव और पशु स्वास्थ्य के बीच बेहतर समन्वय के लिए National Rabies Control Programme (NRCP) और National Action Plan for dog-mediated Rabies Elimination (NAPRE) जैसी पहलें संचालित की जा रही हैं।

इन प्रयासों में एंटी-रेबीज वैक्सीन की उपलब्धता, स्वास्थ्यकर्मियों की क्षमता बढ़ाना, निगरानी, जन-जागरूकता और कुत्तों से फैलने वाले रेबीज को नियंत्रित करने जैसी गतिविधियां शामिल हैं।

भारत में बड़ी आबादी और कुत्तों से होने वाले काटने के मामलों को देखते हुए ग्रामीण तथा दूरदराज के क्षेत्रों तक समय पर PEP पहुंचाना महत्वपूर्ण चुनौती है।

One Health मॉडल क्यों जरूरी?

रेबीज यह स्पष्ट करता है कि इंसानों और पशुओं के स्वास्थ्य को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। One Health दृष्टिकोण के तहत डॉक्टर, पशु चिकित्सक, स्थानीय निकाय, स्वास्थ्य विभाग, पशुपालन विभाग और समुदाय मिलकर काम करते हैं।

स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित व्यक्ति को PEP उपलब्ध कराते हैं, जबकि पशु चिकित्सक पशुओं की निगरानी और टीकाकरण में भूमिका निभाते हैं। स्थानीय निकाय कुत्तों की आबादी और टीकाकरण अभियान में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

भूटान से मिली बड़ी सीख

रेबीज नियंत्रण की दिशा में भूटान का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है। WHO ने सितंबर 2026 में भूटान को कुत्तों से फैलने वाले मानव रेबीज को सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त करने वाला देश प्रमाणित किया।

इस उपलब्धि में कुत्तों का व्यापक टीकाकरण, आबादी प्रबंधन, निगरानी और समुदाय आधारित One Health प्रयासों की भूमिका रही। यह उदाहरण बताता है कि लगातार और समन्वित प्रयासों से रेबीज उन्मूलन की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

2030 तक रेबीज खत्म करने का लक्ष्य

वैश्विक स्तर पर “Zero by 30” पहल का उद्देश्य वर्ष 2030 तक कुत्तों से फैलने वाले मानव रेबीज के कारण होने वाली मौतों को समाप्त करना है।

इसके लिए तीन प्रमुख क्षेत्रों पर लगातार काम करना जरूरी है—कुत्तों का बड़े पैमाने पर टीकाकरण, इंसानों को समय पर PEP उपलब्ध कराना और लोगों में सही जानकारी एवं जागरूकता बढ़ाना।

जागरूकता से बच सकती है जान

रेबीज से बचाव में सबसे महत्वपूर्ण संदेश सरल है—काटे या खरोंचे जाने के बाद इंतजार न करें।

घाव को तुरंत साबुन और बहते पानी से धोएं और जल्द से जल्द स्वास्थ्य केंद्र पहुंचें। घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लें।

विश्व रेबीज दिवस 2026 की थीम “Stronger Together” इसी सामूहिक जिम्मेदारी को सामने रखती है। सरकार, स्वास्थ्यकर्मी, पशु चिकित्सक, स्थानीय निकाय और आम नागरिक मिलकर काम करें तो रेबीज से होने वाली मौतों को बड़े स्तर पर रोका जा सकता है।

यह आलेख वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज एवं सफदरजंग अस्पताल, नई दिल्ली के मेडिसिन विभाग के सीनियर प्रोफेसर डॉ. अश्वनी राय से हुई विस्तृत बातचीत और उनके चिकित्सकीय अनुभव पर आधारित है।

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