BRICS Summit 2026: बदलती दुनिया में वैश्विक दक्षिण की आवाज, भारत ने सहयोग और साझा विकास का दिया संदेश

नई दिल्ली में आयोजित BRICS Summit 2026 ने वैश्विक दक्षिण की प्राथमिकताओं, आर्थिक सहयोग, AI, डिजिटल तकनीक, स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी। भारत की मेजबानी में सम्मेलन ने संवाद, बहुपक्षीय सहयोग और समावेशी विकास का संदेश दिया।

Sep 14, 2026 - 17:08
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BRICS Summit 2026: बदलती दुनिया में वैश्विक दक्षिण की आवाज, भारत ने सहयोग और साझा विकास का दिया संदेश
BRICS Summit 2026: बदलती दुनिया में वैश्विक दक्षिण की आवाज, भारत ने सहयोग और साझा विकास का दिया संदेश

नई दिल्ली: दुनिया इस समय तेजी से बदल रही है। वैश्विक राजनीति में नए समीकरण बन रहे हैं, अर्थव्यवस्था को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल तकनीक तथा स्वच्छ ऊर्जा विकास की नई संभावनाएं खोल रहे हैं। दूसरी ओर युद्ध, आतंकवाद, आर्थिक असमानता, जलवायु परिवर्तन, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा और स्वास्थ्य संकट जैसी समस्याएं देशों के सामने लगातार बनी हुई हैं।

ऐसे दौर में अंतरराष्ट्रीय सहयोग, संवाद और साझेदारी की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। इसी व्यापक संदर्भ में नई दिल्ली में आयोजित BRICS Summit 2026 को महत्वपूर्ण माना गया। भारत की मेजबानी में हुए इस सम्मेलन ने केवल सदस्य देशों के बीच सहयोग की चर्चा नहीं की, बल्कि विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं को भी वैश्विक मंच पर प्रमुखता से सामने रखा।

अर्थव्यवस्था से कहीं आगे बढ़ा BRICS

जब BRICS की शुरुआत हुई थी, तब इसका मुख्य फोकस उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक सहयोग पर था। समय के साथ समूह का एजेंडा काफी व्यापक हो गया है। आज स्वास्थ्य, शिक्षा, विज्ञान, डिजिटल अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, कृषि, जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा और महिला एवं युवा सशक्तिकरण जैसे विषय भी इसके विमर्श का हिस्सा हैं।

नई दिल्ली सम्मेलन ने यह विचार मजबूत किया कि वैश्विक विकास तभी सार्थक माना जा सकता है, जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। इसके लिए देशों के बीच तकनीक, वित्त, ज्ञान और अनुभव साझा करने की आवश्यकता है।

बदलती विश्व व्यवस्था में BRICS की प्रासंगिकता

BRICS में अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं, आर्थिक परिस्थितियों और भौगोलिक क्षेत्रों वाले देश शामिल हैं। इसके बावजूद साझा हितों से जुड़े मुद्दों पर सहयोग की कोशिश समूह की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है।

विकासशील देश लंबे समय से वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व और निर्णय प्रक्रिया में अपनी भूमिका बढ़ाने की मांग करते रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार, विकासशील देशों की भागीदारी और वैश्विक संसाधनों तक समान अवसर जैसे मुद्दे इसी व्यापक सोच से जुड़े हैं।

नई दिल्ली में BRICS सम्मेलन ने इन आकांक्षाओं को एक साझा मंच दिया और बहुपक्षीय व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने की जरूरत को रेखांकित किया।

भारत ने रखी ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताएं

भारत की विदेश नीति में विकासशील देशों की चिंताओं को लगातार महत्व दिया जाता रहा है। भारत का मानना है कि वैश्विक विकास का एजेंडा केवल विकसित देशों की प्राथमिकताओं तक सीमित नहीं होना चाहिए।

ग्लोबल साउथ के कई देशों के सामने गरीबी, रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां हैं। इनका समाधान किसी एक देश के प्रयास से संभव नहीं है।

BRICS भारत को ऐसे मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने और विकासशील देशों के अनुभवों तथा जरूरतों को वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनाने का अवसर देता है।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और साझा भविष्य की सोच

भारत की सभ्यतागत सोच में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का विचार पूरी मानवता को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा देता है। आज जलवायु परिवर्तन, महामारी, आर्थिक अस्थिरता और डिजिटल तकनीक जैसी चुनौतियां किसी एक सीमा तक सीमित नहीं हैं।

ऐसे में इन समस्याओं के समाधान के लिए भी सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। नई दिल्ली में BRICS के मंच पर भारत ने सहयोग, संवाद और साझा विकास की इसी सोच को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।

इस दृष्टिकोण में BRICS को किसी दूसरे शक्ति-समूह के विरोध के बजाय विकास, सहयोग और वैश्विक हितों के लिए काम करने वाले मंच के रूप में देखने की कोशिश दिखाई देती है।

आर्थिक सहयोग से खुलेंगे नए अवसर

BRICS की बुनियादी ताकत अब भी आर्थिक सहयोग है। सदस्य देशों के बीच व्यापार, निवेश और आपूर्ति शृंखला को मजबूत करना आने वाले समय में महत्वपूर्ण हो सकता है।

हाल के वैश्विक संकटों ने यह दिखाया है कि किसी एक क्षेत्र या देश पर अत्यधिक निर्भरता आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में बड़ी समस्या बन सकती है। ऐसे में सुरक्षित और विविध आपूर्ति शृंखलाएं जरूरी हैं।

BRICS देश छोटे और मध्यम उद्यमों को वैश्विक बाजारों से जोड़ने, स्थानीय उत्पादन बढ़ाने और तकनीक के जरिए व्यापार को आसान बनाने में सहयोग कर सकते हैं। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान व्यवस्था पर सहयोग भी भविष्य में आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाने का एक विकल्प बन सकता है।

हालांकि, ऐसे प्रयासों के सामने व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। इसलिए चरणबद्ध तरीके से सहयोग और लगातार संवाद जरूरी होगा।

AI और डिजिटल तकनीक की नई भूमिका

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल तकनीक 21वीं सदी के सबसे बड़े परिवर्तनकारी माध्यमों में शामिल हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, प्रशासन और शोध में AI के इस्तेमाल की संभावनाएं तेजी से बढ़ी हैं।

लेकिन इसके साथ डेटा सुरक्षा, रोजगार, गलत सूचना, डिजिटल असमानता और जिम्मेदार तकनीकी इस्तेमाल जैसे सवाल भी सामने आए हैं।

भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और फिनटेक क्षेत्र का अनुभव विकासशील देशों के लिए उपयोगी हो सकता है। हालांकि, डिजिटल बदलाव तभी समावेशी माना जाएगा जब तकनीक की पहुंच समाज के कमजोर और दूरदराज के वर्गों तक भी हो।

AI का विकास मानव-केंद्रित और जिम्मेदार तरीके से होना जरूरी है, ताकि यह मानव क्षमता को बढ़ाए, न कि नई असमानताओं को जन्म दे।

स्वास्थ्य सहयोग भी अहम

कोविड-19 महामारी ने दुनिया को दिखाया कि स्वास्थ्य सुरक्षा वैश्विक सुरक्षा से अलग नहीं है। किसी एक देश में पैदा हुआ स्वास्थ्य संकट तेजी से दूसरे देशों तक पहुंच सकता है।

इसलिए महामारी की तैयारी, वैक्सीन और जरूरी दवाओं की उपलब्धता, चिकित्सा अनुसंधान तथा स्वास्थ्य तकनीक में सहयोग महत्वपूर्ण है।

BRICS देशों के बीच प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने, मेडिकल विशेषज्ञता साझा करने और सस्ती एवं गुणवत्तापूर्ण दवाओं की उपलब्धता बढ़ाने की दिशा में सहयोग की व्यापक संभावनाएं हैं।

डिजिटल हेल्थ और AI दूरदराज के इलाकों में बीमारी की पहचान, निगरानी और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बेहतर करने में भी मदद कर सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन और स्वच्छ ऊर्जा

जलवायु परिवर्तन का असर विकासशील देशों पर विशेष रूप से पड़ रहा है। बाढ़, सूखा, अत्यधिक गर्मी और अन्य प्राकृतिक आपदाएं लोगों की आजीविका को प्रभावित कर रही हैं।

BRICS देशों के लिए विकास की जरूरतों और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती है। स्वच्छ ऊर्जा, सौर और पवन ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन तथा ऊर्जा दक्षता जैसे क्षेत्रों में सहयोग इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है।

इसके साथ ही विकासशील देशों को जलवायु वित्त और आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराना भी जरूरी है। ऊर्जा परिवर्तन तभी सफल होगा, जब विकासशील देशों की आर्थिक और सामाजिक जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाए।

खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा पर जोर

वैश्विक संकटों के दौरान खाद्य और ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ता है। इसलिए BRICS देशों के लिए इन दोनों क्षेत्रों में सहयोग रणनीतिक महत्व रखता है।

कृषि तकनीक, सिंचाई, जल संरक्षण, भंडारण और बेहतर आपूर्ति शृंखला के जरिए खाद्य सुरक्षा को मजबूत किया जा सकता है। छोटे किसानों को तकनीक और बाजार से जोड़ना भी महत्वपूर्ण होगा।

ऊर्जा के क्षेत्र में पारंपरिक स्रोतों के साथ नवीकरणीय ऊर्जा पर सहयोग बढ़ाना भविष्य की जरूरत है।

युवा आबादी को अवसर देना जरूरी

BRICS देशों में बड़ी युवा आबादी मौजूद है। यह समूह के लिए बड़ी आर्थिक और सामाजिक ताकत बन सकती है, लेकिन इसके लिए युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल और रोजगार के अवसर देने होंगे।

AI, रोबोटिक्स, डिजिटल सेवाओं और हरित अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ रोजगार का स्वरूप भी बदल रहा है। ऐसे में युवाओं को भविष्य की नौकरियों के अनुरूप प्रशिक्षित करना आवश्यक होगा।

विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और तकनीकी संस्थानों के बीच सहयोग, छात्र आदान-प्रदान तथा संयुक्त शोध कार्यक्रम युवाओं के लिए नए अवसर पैदा कर सकते हैं।

महिला सशक्तिकरण के बिना विकास अधूरा

समावेशी विकास के लिए महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक स्वतंत्रता और नेतृत्व में भागीदारी बढ़ाना आवश्यक है।

BRICS देशों के बीच महिला उद्यमिता, डिजिटल कौशल, वित्तीय समावेशन और रोजगार से जुड़े सफल मॉडलों को साझा किया जा सकता है। खासकर ग्रामीण और छोटे शहरों की महिलाओं को डिजिटल तकनीक और वित्तीय सेवाओं से जोड़ने से आर्थिक अवसरों का विस्तार हो सकता है।

महिला सशक्तिकरण का प्रभाव केवल महिलाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवार और पूरी अर्थव्यवस्था पर इसका सकारात्मक असर पड़ता है।

शांति और संवाद की जरूरत

दुनिया के कई हिस्सों में संघर्ष और तनाव की स्थिति बनी हुई है। युद्ध और अस्थिरता का सबसे ज्यादा असर आम नागरिकों पर पड़ता है और विकास की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है।

ऐसे समय में BRICS संवाद के लिए एक ऐसा मंच बन सकता है जहां अलग-अलग विचार रखने वाले देश साझा हितों पर बातचीत कर सकें।

शांति का अर्थ केवल युद्ध की अनुपस्थिति नहीं है। इसमें आर्थिक अवसर, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता तथा सम्मानजनक जीवन भी शामिल हैं। इसलिए संवाद और कूटनीति के जरिए समाधान तलाशना महत्वपूर्ण है।

बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार की जरूरत

विश्व अर्थव्यवस्था और वैश्विक शक्ति-संतुलन में पिछले दशकों में बड़ा बदलाव आया है। इसके बावजूद कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की संरचना पुराने दौर की परिस्थितियों से प्रभावित है।

विकासशील देश चाहते हैं कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उनका प्रतिनिधित्व और प्रभाव बढ़े। संयुक्त राष्ट्र समेत प्रमुख बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार की मांग इसी आवश्यकता से जुड़ी है।

BRICS इस मुद्दे पर विकासशील देशों की सामूहिक आवाज को मजबूत करने का माध्यम बन सकता है। भारत की भूमिका इस संदर्भ में अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और संतुलित वैश्विक व्यवस्था की वकालत करने वाली रही है।

संस्कृति और लोगों के बीच संपर्क भी जरूरी

देशों के रिश्ते केवल सरकारों और राजनयिकों के बीच नहीं बनते। संस्कृति, शिक्षा, पर्यटन, कला और लोगों के बीच संपर्क भी आपसी समझ को मजबूत करते हैं।

BRICS देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान, विश्वविद्यालयों के सहयोग और पर्यटन को बढ़ावा देकर नागरिक स्तर पर संबंधों को मजबूत किया जा सकता है।

आम नागरिक तक पहुंचना चाहिए BRICS का लाभ

किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच की सफलता का वास्तविक पैमाना यह है कि उसके फैसलों का आम नागरिक के जीवन पर क्या असर पड़ता है।

यदि सहयोग से किसानों को बेहतर बाजार, युवाओं को रोजगार, मरीजों को सस्ती दवाएं, महिलाओं को आर्थिक अवसर और लोगों को सस्ती एवं स्वच्छ ऊर्जा मिलती है, तभी वैश्विक सहयोग का वास्तविक लाभ दिखाई देगा।

इसलिए BRICS की प्राथमिकताएं बड़ी घोषणाओं से आगे बढ़कर जमीनी स्तर पर परिणाम देने वाली होनी चाहिए।

चुनौतियां भी बनी रहेंगी

BRICS के सामने संभावनाओं के साथ कई चुनौतियां भी हैं। सदस्य देशों की राजनीतिक व्यवस्थाएं, आर्थिक परिस्थितियां और रणनीतिक प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। ऐसे में हर मुद्दे पर सहमति बनाना आसान नहीं है।

व्यापार, भुगतान व्यवस्था, ऊर्जा और तकनीकी मानकों जैसे क्षेत्रों में भी अलग-अलग हित सामने आ सकते हैं। लेकिन बहुपक्षीय सहयोग की सफलता के लिए हर मुद्दे पर एक जैसी राय जरूरी नहीं है। साझा हितों वाले क्षेत्रों की पहचान करके व्यावहारिक सहयोग आगे बढ़ाया जा सकता है।

नई दिल्ली से साझा भविष्य का संदेश

BRICS Summit 2026 को व्यापक दृष्टि से देखें तो यह बदलती वैश्विक व्यवस्था में सहयोग और साझा समाधान की तलाश का महत्वपूर्ण मंच रहा। भारत की मेजबानी ने आर्थिक विकास के साथ सामाजिक समावेशन, तकनीकी प्रगति के साथ मानवीय मूल्यों और ऊर्जा सुरक्षा के साथ पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की जरूरत को सामने रखा।

भारत के लिए यह सम्मेलन अपनी वैश्विक भूमिका को जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ाने का अवसर भी रहा। अलग-अलग विचारों और हितों वाले देशों को संवाद की मेज पर साथ लाना बहुपक्षीय कूटनीति की महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

आने वाले समय में BRICS की प्रासंगिकता केवल उसकी आर्थिक ताकत से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होगी कि वह वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं और आम लोगों की जरूरतों को कितनी प्रभावी ढंग से वैश्विक एजेंडे का हिस्सा बनाता है।

निष्कर्ष

BRICS Summit 2026 ने यह संदेश मजबूत किया कि 21वीं सदी की जटिल चुनौतियों का समाधान किसी एक देश के प्रयास से संभव नहीं है। तकनीक, स्वास्थ्य, जलवायु, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, शिक्षा और रोजगार जैसे क्षेत्रों में सहयोग की जरूरत बढ़ती जा रही है।

नई दिल्ली से सामने आया साझा विकास और साझा भविष्य का दृष्टिकोण इस बात पर जोर देता है कि वैश्विक प्रगति का वास्तविक अर्थ तभी है, जब उसका लाभ अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे। संवाद, साझेदारी और समावेशी विकास के जरिए ही अधिक संतुलित और टिकाऊ वैश्विक व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

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