PM मोदी ने संस्कृत सुभाषित साझा कर दिया समृद्धि और परोपकार का संदेश, जानें श्लोक का अर्थ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘सुभाषितरत्नभाण्डागारम्’ से संस्कृत का एक श्लोक साझा किया। इसमें स्वावलंबी समृद्धि, परोपकार और समाज के लिए उपयोगी जीवन का संदेश दिया गया है।

Sep 18, 2026 - 09:12
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PM मोदी ने संस्कृत सुभाषित साझा कर दिया समृद्धि और परोपकार का संदेश, जानें श्लोक का अर्थ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को संस्कृत के एक प्रसिद्ध सुभाषित को साझा करते हुए समृद्धि, स्वावलंबन और समाज के प्रति जिम्मेदारी का संदेश दिया। उन्होंने ‘सुभाषितरत्नभाण्डागारम्’ ग्रंथ से एक श्लोक सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, जिसमें सज्जन और सत्पुरुष के जीवन की सार्थकता को परोपकार तथा लोक-कल्याण से जोड़ा गया है।

पीएम मोदी ने जो श्लोक साझा किया, वह इस प्रकार है—

«“स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया।

सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥”»

इस श्लोक में स्वतंत्र रूप से अर्जित समृद्धि, दूसरों के लिए उपयोगी बनने और ऊंचा उठकर समाज को सहारा देने जैसे विचारों को प्रमुखता दी गई है।

क्या है श्लोक का हिंदी भावार्थ?

श्लोक का भाव यह है कि स्वाधीन समृद्धि ही वास्तविक वैभव है। व्यक्ति की महानता केवल उसके अपने विकास में नहीं, बल्कि इस बात में भी है कि वह दूसरों के लिए कितना उपयोगी और सहायक बनता है।

मरुभूमि यानी रेगिस्तान का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि वहां छाया और जीवनदायी सहारा बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। उसी प्रकार श्रेष्ठ व्यक्ति का जीवन भी दूसरों को आश्रय, सहयोग और राहत देने वाला होना चाहिए।

कहां से लिया गया है यह श्लोक?

यह श्लोक ‘सुभाषितरत्नभाण्डागारम्’ के ‘सामान्यप्रकरणम्’ के अंतर्गत आने वाले ‘सज्जनप्रशंसा’ अध्याय का 133वां श्लोक बताया गया है।

‘सुभाषितरत्नभाण्डागारम्’ संस्कृत के विभिन्न स्रोतों और कालखंडों से चुने गए श्लोकों का एक महत्वपूर्ण संग्रह है। इसका संकलन नारायण राम आचार्य (काव्यतीर्थ) ने किया था। ग्रंथ में जीवन, नीति, सदाचार और मानवीय मूल्यों से जुड़े अनेक संस्कृत सुभाषितों को संकलित किया गया है।

मरुभूमि के रूपक में छिपा संदेश

इस श्लोक में रेगिस्तान का रूपक खास तौर पर ध्यान आकर्षित करता है। मरुभूमि में पानी, छाया और जीवन के साधन दुर्लभ होते हैं। ऐसे वातावरण में कोई छायादार स्थान या जीवन बचाने वाला सहारा बेहद मूल्यवान माना जाता है।

इसी प्रतीक के माध्यम से सत्पुरुष के जीवन की तुलना की गई है। इसके तीन प्रमुख संदेश सामने आते हैं—

- समृद्धि स्वावलंबी होनी चाहिए।

- व्यक्ति का जीवन दूसरों के लिए उपयोगी होना चाहिए।

- ऊंचाई हासिल करने के बाद दूसरों को सहारा और छाया देनी चाहिए।

लोक-कल्याण से जुड़ा है संदेश

सुभाषित का मूल भाव यह बताता है कि किसी व्यक्ति की श्रेष्ठता केवल उसके पद, संपत्ति या उपलब्धियों से तय नहीं होती। उसका जीवन समाज के लिए कितना उपयोगी है, यह भी उसकी महानता का महत्वपूर्ण आधार है।

पीएम मोदी द्वारा इस संस्कृत सुभाषित को साझा किए जाने से स्वावलंबन, परोपकार और लोक-कल्याण जैसे मूल्यों पर ध्यान गया है। श्लोक का मरुभूमि रूपक यह संदेश देता है कि कठिन परिस्थितियों में दूसरों के लिए सहारा बनना ही सज्जन व्यक्ति के जीवन को सार्थक बनाता है।

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