समान वेतन की राह में पारदर्शिता और देखभाल नीतियां क्यों हैं जरूरी? ILO की नई गाइड में क्या कहा
महिलाओं और पुरुषों के बीच वेतन अंतर कम करने के लिए वेतन पारदर्शिता, निष्पक्ष नौकरी मूल्यांकन, सामाजिक सुरक्षा और देखभाल संबंधी नीतियों को मजबूत करना जरूरी है। ILO की 2026 की गाइड में pay equity के लिए व्यापक रणनीति पर जोर दिया गया है।
नई दिल्ली: महिलाओं और पुरुषों के बीच वेतन असमानता को कम करना केवल समान वेतन का कानूनी प्रावधान बनाने तक सीमित नहीं है। इसके लिए कार्यस्थलों पर वेतन व्यवस्था में पारदर्शिता, नौकरियों का निष्पक्ष मूल्यांकन, समान अवसर और प्रभावी शिकायत निवारण के साथ-साथ देखभाल से जुड़ी नीतियों को मजबूत करना भी जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की 2026 में जारी गाइड में भी pay equity यानी समान मूल्य वाले काम के लिए समान पारिश्रमिक हासिल करने के लिए व्यापक और समन्वित नीतियों पर जोर दिया गया है।
वेतन पारदर्शिता से कम हो सकता है अंतर
वेतन व्यवस्था में पारदर्शिता कर्मचारियों के बीच अनुचित वेतन अंतर की पहचान करने में मदद कर सकती है। यदि किसी पद के लिए वेतन तय करने के मानदंड स्पष्ट हों और समान जिम्मेदारी वाले कर्मचारियों के वेतन की नियमित समीक्षा की जाए, तो असमानता के संभावित मामलों को सामने लाना आसान होता है।
नौकरी का मूल्यांकन केवल पदनाम के आधार पर नहीं, बल्कि आवश्यक कौशल, अनुभव, जिम्मेदारी, प्रयास और काम करने की परिस्थितियों जैसे कारकों के आधार पर किया जाना चाहिए। ILO भी वस्तुनिष्ठ जॉब इवैल्यूएशन और pay transparency को gender pay gap कम करने की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है।
केवल कानून से नहीं बदलेगी तस्वीर
समान वेतन के लिए कानून जरूरी है, लेकिन सामाजिक और कार्यस्थलीय व्यवहार में बदलाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कई पेशों को लंबे समय से पुरुषों या महिलाओं से जोड़कर देखा जाता रहा है। ऐसी धारणाएं अलग-अलग क्षेत्रों में महिलाओं और पुरुषों की भागीदारी तथा आय के अवसरों को प्रभावित कर सकती हैं।
घरेलू काम और बच्चों या बुजुर्गों की देखभाल को मुख्य रूप से महिलाओं की जिम्मेदारी मानने की सोच भी उनके रोजगार और करियर की निरंतरता पर असर डाल सकती है। परिवार में देखभाल संबंधी जिम्मेदारियों का अधिक समान बंटवारा महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और पेशेवर विकास में आगे बढ़ने के अवसर दे सकता है।
भारत में समान वेतन को लेकर क्या है कानूनी प्रावधान?
भारत के Code on Wages, 2019 में एक ही नियोक्ता के यहां समान या समान प्रकृति के काम के लिए लिंग के आधार पर वेतन में भेदभाव पर रोक का प्रावधान है। कानून में समान या समान प्रकृति के काम का आकलन कौशल, प्रयास, अनुभव और जिम्मेदारी जैसे कारकों के आधार पर किया गया है।
हालांकि, कानूनी प्रावधानों के प्रभावी पालन के लिए कार्यस्थलों पर निगरानी, कर्मचारियों को अधिकारों की जानकारी और आसान शिकायत निवारण व्यवस्था जरूरी है। समान वेतन का सिद्धांत तभी प्रभावी हो सकता है जब कर्मचारी अपने अधिकारों को समझें और उल्लंघन की स्थिति में उन्हें उचित समाधान तक पहुंच मिल सके।
महिलाओं के लिए रोजगार की गुणवत्ता भी अहम
महिला श्रम बल भागीदारी बढ़ाना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ रोजगार की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना जरूरी है। सुरक्षित और सम्मानजनक कार्यस्थल, नियमित रोजगार, कौशल विकास और बेहतर आय वाले क्षेत्रों तक महिलाओं की पहुंच बढ़ाने की जरूरत है।
ILO की 2026 की गाइड में सामाजिक सुरक्षा, श्रम निरीक्षण, सामाजिक संवाद और care policies को भी pay equity की व्यापक रणनीति में शामिल किया गया है। संगठन के अनुसार वैश्विक स्तर पर wage employment में महिलाएं औसतन पुरुषों की तुलना में करीब 20 प्रतिशत कम कमाती हैं।
क्रेच से लेकर पितृत्व अवकाश तक जरूरी नीतियां
महिलाओं को रोजगार में बनाए रखने में देखभाल से जुड़ी सुविधाओं की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। क्रेच, मातृत्व सुविधाएं, पितृत्व अवकाश, लचीली कार्य व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा जैसी नीतियां काम और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने में मदद कर सकती हैं।
ऐसी नीतियों का उद्देश्य केवल महिलाओं को रोजगार में बनाए रखना नहीं, बल्कि देखभाल की जिम्मेदारी को परिवार और समाज में अधिक समान रूप से बांटना भी है। ILO की नई गाइड में unpaid care work, career breaks और part-time work को भी महिलाओं की आय और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों के रूप में रेखांकित किया गया है।
आंकड़ों से बननी चाहिए नीति
वेतन असमानता को समझने के लिए विश्वसनीय और नियमित आंकड़े जरूरी हैं। अलग-अलग क्षेत्रों, रोजगार के प्रकार और सामाजिक समूहों के आधार पर उपलब्ध आंकड़ों से यह पता लगाने में मदद मिलती है कि असमानता किन क्षेत्रों में अधिक है और किन नीतियों की जरूरत है।
भारत में Periodic Labour Force Survey यानी PLFS श्रम बाजार से जुड़े नियमित आंकड़े उपलब्ध कराता है। PLFS 2025 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों के लिए usual status में भारत का कुल LFPR 59.3 प्रतिशत था। महिलाओं के लिए यह दर ग्रामीण क्षेत्रों में 34.6 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 22.2 प्रतिशत दर्ज की गई।
काम का मूल्य लिंग नहीं, योगदान से तय हो
समान वेतन का सवाल केवल दो कर्मचारियों को समान राशि देने तक सीमित नहीं है। ILO के अनुसार “work of equal value” की अवधारणा अलग-अलग तरह के कामों के बीच भी समान मूल्य का आकलन करने पर जोर देती है। इसके लिए नौकरी के कौशल, जिम्मेदारी, प्रयास और कार्य परिस्थितियों जैसे पहलुओं का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन किया जा सकता है।
इसलिए वास्तविक pay equity के लिए कानून, पारदर्शी वेतन प्रणाली, निष्पक्ष नौकरी मूल्यांकन, कौशल विकास, सामाजिक सुरक्षा और देखभाल संबंधी सुविधाओं को साथ लेकर चलना जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय समान वेतन दिवस इसी व्यापक चुनौती की ओर ध्यान आकर्षित करता है।
आखिरकार, समान वेतन का लक्ष्य केवल वेतन में अंतर खत्म करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति के काम का मूल्यांकन उसके लिंग के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी योग्यता, जिम्मेदारी, कौशल और योगदान के आधार पर हो।
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